chevron_left  आनृशंस्यगुणोपेतैःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यगुणोपेतैः कामक्रोधविवर्जिताः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव निय़तात्मभिः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखः सततं भव |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरो राजन्नानर्थमववुध्यसे ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरो राजा चकारानुग्रहं प्रभुः ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यपरो राजा प्रीय़माणो युधिष्ठिरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
आनृशंस्यप्रवृत्तस्य सर्वावस्थं पदं भवेत् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन्सत्पुरुषोचितम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यमथ क्षमा ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
आनृशंस्यमसंमोहो दय़ा भूतेष्वपैशुनम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १७७
सर्प उवाच
आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
आनृशंस्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता |
२३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्यसमाय़ुक्तं प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
आनृशंस्यादनुक्रोशाद्योऽसौ धर्मभृतां वरः |
८३ क
वन पर्व
अध्याय २०६
ऋषिरु उवाच
आनृशंस्यादहं किञ्चित्कर्तानुग्रहमद्य ते ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या वुद्धिः सततमच्युत ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
आनृशंस्ये दमे सत्ये आर्जवे च स्थिरो भव ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
यक्ष उवाच
आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामि तेऽनघ ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
राजपुत्र उवाच
आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिञ्जिजीविषुः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्येन यद्व्रूय़ां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
मुनिरु उवाच
आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रिय़ेच्छसि जीवितुम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्संनिग्रहेण च ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
आनृशंस्येऽनुरक्तस्य भक्तस्यानुगतस्य च ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
आन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
आन्ध्रास्तालचराश्चैव चूचुपा वेणुपास्तथा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
आनय़त्तत्सरो दिव्यं तय़ा भिन्नं च तत्सरः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ध्वं द्वारकाय़ा अग्नीन्वै याजकांस्तथा ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
आनय़स्व पितरं संशितव्रतं; गान्धारीं च महिषीमाजमीढ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़स्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ामास गान्धारीं धृतराष्ट्रस्य शासनात् ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ित्वा कुरुश्रेष्ठो व्राह्मणेभ्यः प्रय़च्छतु |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
आनय़ित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्ययोजय़म् ||
१२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़िष्यति वेगेन वसिष्ठं जपतां वरम् |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
आनय़िष्यामि ते राजन्वशमद्य न संशय़ः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
आनय़िष्यामि स्वं स्थानं वाराहं रूपमास्थितः ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़िष्याम्यहं पार्थान्वशं तव जनाधिप ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ेह तय़ा सार्धमनुनेष्यामि दुर्मतिम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ेह सुतं क्षिप्रं राज्यकामुकमातुरम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
आप एव मनुष्येषु द्रवन्त्यः परिचारिकाः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
आपः प्लवन्त्वन्तरिक्षे वृथा च; सौदामिनी दृश्यतां मा विभस्त्वम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
अग्निरु उवाच
आपः शेषाः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
आपः संस्तम्भिरे यस्य समुद्रस्य यिय़ासतः |
१३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
आपःप्रपतने स्नातः सेव्यते सोऽप्सरोगणैः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
आपगा नाम विख्याता नदी सिद्धनिषेविता ||
५५ ख