आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
आपगानां वनानां च कथय़ामास सात्वते ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
आपगामवगाढस्य राजन्प्रक्रीडितं महत् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
आपगाय़ां नरः स्नात्वा अर्चय़ित्वा महेश्वरम् |
१५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
आपगेय़ं पुरस्कृत्य भ्रातृभिः सहितस्तदा |
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
आपगेय़ं महात्मानं भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
आपगेय़ं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत्सुदुःखितः ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
आपगेय़ं हतं श्रुत्वा द्रोणं च समरे परैः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
आपणेषु विहारेषु समवाय़ेषु भिक्षुषु ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
आपतत्येष दुष्टात्मा सङ्क्रुद्धः पुरुषादकः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
आपतत्सहसा राजन्यत्र राजा व्यवस्थितः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
आपतत्सु च वेगेन वध्यमाने वलेऽपि च |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
आपतत्सु रथौघेषु प्रभूतगजवाजिषु |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
आपतद्भिर्महावेगैश्चित्रसेनस्य सैनिकैः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
आपतद्भिस्तु तैस्तत्र प्रभग्नं तावकं वलम् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं गजानीकं दृष्ट्वा पार्थो वृकोदरः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं च तं दृष्ट्वा गजानीकं वृकोदरः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं च सहसा पाण्डवानां महद्वलम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं तु निस्त्रिंशं युद्धमार्गविशारदः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं महावेगं धृष्टद्युम्नसमीरितम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं रथं तं तु शङ्खवर्णैर्हय़ोत्तमैः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं रथं तस्य शल्यः समितिशोभनः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तं सुदुष्पारं समुद्रमिव पर्वणि ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तमपासेधत्प्रपानादिव कुञ्जरम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
आपतन्तीं तु सम्प्रेक्ष्य गन्धर्वाणां महाचमूम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तीं महाराज वेलामिव महोदधिः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तीं महाशक्तिं तव पुत्रप्रचोदिताम् |
९३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
आपतन्तीं महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
आपतन्त्यर्जुनं शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
आपतन्नेव च रणे भीमसेनं शिलाशितैः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितवुद्धय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
युधिष्ठिर उवाच
आपत्सु च यथा नीतिर्विधातव्या महीक्षिता |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
आपत्सु मरणाद्भीतैर्लिङ्गप्रतिनिधिः कृतः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
आपत्सु यो धारय़ति ध्रमं धर्मविदुत्तमः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
आपत्सु विहितं स्तेय़ं विशिष्टसमहीनतः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
आपत्स्वेव च वोढव्यं भवद्भिः सद्गवैरिव |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
आपदं तेन मां पार्थ स सम्वोधितवान्पुरा ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
आपदं समनुप्राप्य स शोचत्यनय़े स्थितः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
आपदर्थं हि निचय़ान्राजान इह चिन्वते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
आपदर्थे हि सम्वन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते ||
६० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
आपदश्चापि वोद्धव्या वहुरूपा नराधिप |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
आपदस्तरणे प्राणान्धारय़ेद्येन येन हि |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
आपदस्तु कथं शक्याः परिपाठेन वेदितुम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
आपदां पदकालेषु कुर्वीत न विचारय़ेत् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
आपदेवास्य मरणात्पुरुषस्य गरीय़सी |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
आपदो द्विविधाः कृष्ण वाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ह |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः ||
१७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
आपद्गतमिमं मन्ये नास्त्यस्य सदृशो रथः ||
१ ख