द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
आपूरय़ञ्शरैस्तीक्ष्णैस्तटाकमिव वृष्टिभिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
आपूरय़ेच्च परिखाः स्थाणुनक्रझषाकुलाः ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छ कुरुशार्दूल गमनं द्वारकां प्रति ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
आपृच्छति च यच्छ्रेय़ः करोति च हितं वचः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छद्भृशदुःखार्ता याश्चान्यास्तत्र योषितः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
आपृच्छामि नगान्नागान्गिरीनुर्वीं दिशो दिवम् |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छामो नरव्याघ्र सर्वकामैः सुपूजिताः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि क्षिप्रमेष्यामि चाप्यहम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि दाशार्हनगरीं प्रति ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वा परिरक्षतु |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे भवतः सर्वान्गमिष्यामि युधिष्ठिरम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
वासुदेव उवाच
आपृच्छे भवतीं शीघ्रं प्रय़ास्ये पाण्डवान्प्रति ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
आपृच्छे साधय़िष्यामि गच्छ शिष्य यथासुखम् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
आपृच्छ्य त्वाद्य गान्धारे गमिष्यामि यथागतम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आपृच्छ्य धर्मराजानं व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च |
४० ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
आपृष्टो मेऽसि कौन्तेय़ स्वस्ति प्राप्नुहि पाण्डव ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
आपृष्टोऽसि महावाहो पुनर्द्रक्ष्यामहे वय़म् |
७२ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
आपृष्टोऽसीह कौन्तेय़ स्वस्ति प्राप्नुहि भारत |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
आपेततुर्महावेगौ समुच्छ्रितमहागदौ |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
आपो देवगणाः सर्वे आपः पितृगणास्तथा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
आपो द्यौः पृथिवी वाय़ुरन्तरिक्षं दिशस्तथा ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः |
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
आपो नारा इति प्रोक्ताः सञ्ज्ञानाम कृतं मय़ा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
आपो नित्यं प्रदेय़ास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
आपो भूत्वा मज्जय़ते च सर्वं; व्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसङ्घान् ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
आपो मूलं फलं चैव ममेदं प्रतिगृह्यताम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
आपो मूलं फलं मांसमन्नं वापि पितृक्षय़े |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
आपो मे निर्जितास्तस्माद्वशे तिष्ठन्ति नित्यदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आपो येन हि युज्यन्ते द्रवत्वं प्राप्नुवन्ति च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
आपो रसातले यास्तु संसृष्टाश्चित्रभानुना |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
आपो वाय़ुर्नभश्चन्द्रो नक्षत्राणि ग्रहा रविः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
आपो वाय़ुश्च तेजश्च त्रय़मेतदकल्पय़त् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
आपो व्रह्म गुरुर्व्रह्म स व्रह्मणि समाहितः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
पितर ऊचुः
आपोमय़ाः सर्वरसाः सर्वमापोमय़ं जगत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
आपोऽथ अद्भ्यः सलिलस्य मध्ये; उभौ देवौ शिश्रिय़ातेऽन्तरिक्षे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
आप्तः कोटनकश्चैव शङ्खो वालशिखस्तथा ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
आप्तः कोटनकश्चैव शिखी निष्ठूरिकस्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
आप्ताचरितमित्येव धर्म इत्येव वा पुनः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
आप्तैर्मनुष्यैरुपचारय़ेत; पुरेषु राष्ट्रेषु च सम्प्रय़ुक्तः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
आप्तैस्तुष्टैश्च सततं धार्यते स नृपोत्तमः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
आप्तो दूतः सञ्जय़ सुप्रिय़ोऽसि; कल्याणवाक्षीलवान्दृष्टिमांश्च |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
धृतराष्ट्र उवाच
आप्तो नः सञ्जय़स्तात शरणं गच्छ केशवम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
आप्तो राजन्कुलीनश्च पर्याप्तो राज्यसङ्ग्रहे ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
आप्तो विवादः परमो विशां पते; न विद्यते किञ्चन मत्स्य हीनतः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
आप्नुवन्ति तपश्चैव व्रह्मचर्यं परं तथा ||
४९ ख