उद्योग पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्र्य गच्छामि शिवं सुखं वः; सौम्येन मां पश्यत चक्षुषा नृपाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य च स तान्प्राय़ाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
आमन्त्र्य तं ततो देवा यय़ुः स्वं स्वं निवेशनम् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य तां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य दारुकं प्राह रथः सज्जो विधीय़ताम् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य द्रौपदीं कृष्णां क्षिप्रमाय़ान्महानसम् ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य धर्मराजानमनुज्ञाप्य च भारत |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्थां; स्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य पाण्डवान्सर्वान्प्रय़युस्तेऽपि भारत ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य पार्थं च वृकोदरं च; धनञ्जय़ं याज्ञसेनीं यमौ च |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य प्रस्थितं शौरिं रथस्थं पुरुषर्षभम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य प्रय़यौ धीमान्पाण्डवान्मधुसूदनः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
आमन्त्र्य भार्गवं प्रीतास्तत्रैवान्तर्दधुस्तदा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन्नलं नृपम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
राक्षसा ऊचुः
आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिवन्ति विहरन्ति च |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य राक्षसश्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं भीमपराक्रमम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य विपुलश्रोणी साम्ना परमवल्गुना |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य वीरांश्च तथैव मान्या; न्गाण्डीवघोषेण विनाद्य लोकान् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं समरोचय़न् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि; सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्र्य सर्वभूतानि व्रह्मेशानानुशासनात् ||
५७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्यान्योन्यमाश्लिष्य ततो जग्मुर्यथागतम् ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्यान्योन्यमीय़ुः स्म भृशमुच्चुक्रुशुस्ततः ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्यान्योन्यमुद्विग्नास्त्रिधा ते प्रय़युस्ततः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
आमन्त्रय़ति राजेन्द्र तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्रय़ति वो राजा धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः |
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्रय़ध्वं राष्ट्रेषु व्राह्मणान्भूमिपानपि |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्रय़ां वभूवुश्च प्रेषय़ामास चापरान् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
व्राह्मण उवाच
आमन्त्रय़ामि भद्रं ते कृतार्थोऽस्मि भुजङ्गम ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
आमन्त्रय़ामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्रय़ित्वा सुश्रोणीं यय़ातिः स्वपुरं यय़ौ ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े त्वा नरदेवदेव; गच्छाम्यहं पाण्डव स्वस्ति तेऽस्तु |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
आमन्त्रय़े त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये तात त्वय़ा सह |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े त्वां भगवन्योत्स्ये विगतकल्मषः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े त्वां व्रूहि जय़ं रणे मे; पुरा भीमं धार्तराष्ट्रा ग्रसन्ते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े वासुदेवं च शौरिं; युय़ुधानं चेकितानं विराटम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
आमपात्रनिभाकाराः पाञ्चाल्यममितौजसम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
आमर्दकाले राजेन्द्र व्यपसर्पस्ततो वरः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
आमाहठः कोमठकः श्वसनो मानवो वटः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
आमिषं चैव नो नष्टमामिषस्य च भोजिनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
आमिषं वन्धनं लोके कर्मेहोक्तं तथामिषम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
आमिषं विघसाशेन तद्वद्राज्यं हि नो हृतम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
आमिषप्रतिसंहारात्प्रजास्याय़ुष्मती भवेत् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
आमिषप्रतिसंहारे पशून्पुत्रांश्च विन्दति ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
आमिषार्थं महाराज गगने श्येनय़ोरिव ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
आमिषार्थी यथा सिंहो वने मत्तमिव द्विपम् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
आमिषार्थे यथा युद्धं श्येनय़ोर्गृद्धय़ोर्नृप ||
३२ ख