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वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
आरण्यकेभ्यो लौहानि भाजनानि प्रय़च्छसि |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
आरण्या वहुसाहस्रा अपश्यं तत्र तत्र गाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
आरण्याः सर्वदैवत्याः प्रोक्षिताः सर्वशो मृगाः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
आरण्याः सर्वदैवत्याः प्रोक्षितास्तपसा मृगाः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः |
१५७ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
पाण्डुरु उवाच
आरण्यान्सर्वदैवत्यान्मृगान्प्रोक्ष्य महावने ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
आरभन्ते सदा पार्थाः प्रार्थय़ाना महद्यशः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
आरभ्यन्ते भीमसेन व्यथन्ते तानि भारत ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
आरम्भः सफलो देवि भविताय़ं तवेप्सितः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
आरम्भांश्चास्य महतो दुष्करांस्त्वं प्रय़ोजय़ |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
आरम्भाच्चैव युद्धानां यदेष कृतवान्प्रभो |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
आरम्भान्द्विषतां प्राज्ञः सर्वानर्थांस्तु सूदय़ेत् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
आरम्भास्तस्य सिध्येरन्न च जातु पराभवेत् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
आरम्भे पारमेष्ठ्यं तु न प्राप्यमिति मे मतिः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
आरम्भो न्याय़युक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
आरम्भय़ज्ञाः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
आरम्भय़ज्ञाः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशस्तथा |
६१ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
आरव्धव्यमिदं कर्म मन्यसे शृणु तत्र मे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
आरव्धान्येव कार्याणि न पर्यवसितानि च |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
आरात्तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
आरादाय़ान्तमभ्येत्य वसातीय़ोऽभ्ययाद्द्रुतम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
आराद्दृष्ट्वा किरन्वाणैरिच्छन्द्रोणस्य जीवितम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
आराद्धिर्नामय़श्चैव चाम्पेय़ोज्जय़नौ तथा |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
आराधनसुखाश्चापि ते नराः स्वर्गगामिनः ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
आराधितः सदारेण स चास्मै प्रददौ वरान् ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
आराधितः सभृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आराधितो महातेजास्तच्चापि शृणु विस्तरम् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
आराधितोऽभूद्भक्तेन तस्योदर्कं निशामय़ ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
आराध्य तपसा देवं हरिं नाराय़णं प्रभुम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
आराध्य तपसोग्रेण देवं हय़शिरोधरम् |
७१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
आराध्य त्र्यम्वकं यत्नाद्व्रतैरुग्रैर्महातपाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आराध्य पशुभर्तारं रुक्मिण्या जनिताः सुताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् |
९ ख
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
आराध्य वरदं विप्रं श्रेय़सा योक्ष्यसे पृथे ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
आराध्य हि महादेवं निर्जितास्तेन पार्थिवाः ||
६३ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
द्रौपद्यु उवाच
आराधय़ं सत्यभामां कृष्णस्य महिषीं प्रिय़ाम् |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
आराधय़न्तो राजानं यदकुर्वन्त तच्छृणु ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
आराधय़न्त्याः कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्च मे ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
आराधय़न्नुपाध्याय़ं देवय़ानीं च भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
आराधय़न्महादेवं वहुरूपमुमापतिम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
आराधय़न्स्वर्गमिमं च लोकं; परं च मुक्त्वा हृदय़व्यलीकम् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
आराधय़ामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आराधय़ामास भवं मनोय़ज्ञेन केशव ||
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
आराधय़ितवाञ्शर्वं वहून्वर्षगणांस्तदा |
१३९ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
आराधय़ित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति सर्वशः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
आराधय़िष्यन्द्रुपदः स तं पर्यचरत्पुनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशय़िष्यन्ति निर्व्यथाः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
युधिष्ठिर उवाच
आरामाणां तडागानां यत्फलं कुरुनन्दन |
१ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकान्यवटास्तथा |
८ क