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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
कष्टात्कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादय़ः |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
कस्तत्कुर्याज्जातु कर्म प्रजान; न्पराजय़ो यत्र समो जय़श्च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
कस्तत्राधिकमात्मानं सन्त्यजेदर्थधर्मवित् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोऽसौ पुरुष उच्यते |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
कस्तमन्यत्र राधेय़ात्प्रतिय़ुध्येज्जिजीविषुः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
कस्तमिच्छेत्परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
कस्तमुत्सहते वीरं युद्धे जरय़ितुं पुमान् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
युधिष्ठिर उवाच
कस्तस्य धर्म्यो विजय़ एतत्पृष्टो व्रवीहि मे ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थं प्राज्ञसंमतः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
कस्तस्य विश्वसेद्वीरो दुर्मतेरकृतात्मनः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
कस्तस्य व्राह्मणस्त्राता को धर्मः किं पराय़णम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
कस्तस्य शक्नुय़ाद्वक्तुं गुणान्कार्त्स्न्येन माधव ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
कस्तस्य समरे स्थाता साक्षादपि शतक्रतुः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसापि प्रधर्षय़ेत् |
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
कस्तांस्तरस्विनो भूय़ः सन्दीपय़ति पाण्डवान् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
कस्ताः शक्तो रक्षितुं स्यादिति मे संशय़ो महान् |
११ क
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
कस्त्वं कस्माच्च नरकं प्रतिपन्नो व्रवीहि तत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान्कवची शरी |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
कस्त्वं भो भुजगश्रेष्ठ किं मय़ा च करिष्यसि ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः; स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १३
पितर ऊचुः
कस्त्वं वन्धुरिवास्माकमनुशोचसि सत्तम ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छय़वर्धन |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कस्त्वदन्य इमा वाचः सुक्रूरा वक्तुमर्हति ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
कस्त्वदन्यः सहेत्साक्षादपि वज्री पुरन्दरः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
सुदेष्णो उवाच
कस्त्वावधीद्वरारोहे कस्माद्रोदिषि शोभने |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
कस्त्वेतद्व्यवसेदार्यस्त्वदन्यः पुरुषाधमः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १३३
राजो उवाच
कस्तय़ोर्गर्भमाधत्ते गर्भं सुषुवतुश्च कम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्म; न्गरीय़से व्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
कस्माच्च दक्षिणार्थं तद्यज्ञकर्मसु शस्यते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
ऐल उवाच
कस्माच्च भवति श्रेय़ानेतद्वाय़ो विचक्ष्व मे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
व्रह्मो उवाच
कस्माच्चित्कारणात्पापः कञ्चित्कालमुपेक्षितः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
कस्माच्चिद्दानय़ोगाद्धि सत्यमेव विशिष्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
कस्माच्छोचथ निश्चेष्टमात्मानं किं न शोचथ ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कस्माच्छोचसि ताञ्शूरान्गतान्परमिकां गतिम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
कस्मात्कमनुशोचेय़मित्येवं स्थापय़ेन्मनः |
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
कस्मात्तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
कस्मात्ते विषमं भागं भजेरन्नृपसत्तम |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कस्मात्त्वपचितिं यान्ति वान्धवा वान्धवे हते ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
गर्दभ्यु उवाच
कस्मात्प्रतिनिवृत्तोऽसि कच्चिन्न कुशलं तव ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
उपमन्युरु उवाच
कस्मात्प्रसादं भगवान्न कुर्यात्तव माधव ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
कस्मात्समाने वहुलाप्रदाने; सद्भिः प्रशस्तं कपिलाप्रदानम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
जनमेजय़ उवाच
कस्मात्सरस्वती व्रह्मन्निवृत्ता प्राङ्मुखी ततः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
कस्मात्सर्वान्समुत्सृज्य स तां पार्थे न मुक्तवान् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
गौतम्यु उवाच
कस्मात्सौम्य भुजगे न क्षमेय़ं; मोक्षं वा किं कारणं नास्य कुर्याम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
कस्मादन्नानि पानानि वासांसि शय़नानि च |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
कस्मादशक्ता निर्जेतुमिति हेतुर्न विद्यते ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
कस्मादहं न क्षमेय़माकाङ्क्षन्नात्मनो हितम् ||
२१ ख