सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
आर्या पृथा राजपुत्री नारण्यं गन्तुमर्हति |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्या माता कुमारस्य पृथक्कामार्थमिज्यते ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
आर्या म्लेच्छाश्च कौरव्य तैर्मिश्राः पुरुषा विभो ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
आर्यां मतिं समास्थाय़ शाम्य भारत पाण्डवैः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा क्षत्रिय़ाणां यशस्करीम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि पार्थाविचारय़न् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
वसिष्ठ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रुं सुरेश्वर ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति स्म संय़ुगम् |
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा प्रत्येहि रथय़ूथपम् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा भीष्ममेवाभिदुद्रुवुः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा यावद्धन्मि जय़द्रथम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा युद्धाय़ैवोपतस्थिरे ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
आर्याः कुलीना ह्रीमन्तो व्राह्मीं वृत्तिमनुष्ठिताः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोऽस्ति जीविते |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
आर्याञ्शीलवतो दृष्ट्वा ह्रीमतो वृत्तिकर्शितान् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
दुर्योधन उवाच
आर्यान्धृतिमतः शूरानग्निकल्पान्प्रवाधितुम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
आर्यामङ्केन वामेन राजानं दक्षिणेन च |
८३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
आर्यामार्य सुभद्रां त्वमिमांश्च त्रिदशोपमान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
आर्यामाश्वासय़ामास भ्रातॄंश्चापि वृकोदरः ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
आर्यावर्तमिमं देशमाजगाम महामुनिः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
आर्यास्तु ये वै राजानः सत्यसन्धा महाव्रताः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आर्ये क्व दारकाः सर्वे द्रष्टुमिच्छामि तानहम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
आर्ये जानासि यद्दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
आर्ये पौत्राः क्व ते सर्वे सौभद्रसहिता गताः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
आर्येण तु न वक्तव्या कदाचित्स्तुतिरात्मनः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
आर्येण सुकरं ह्याहुरार्यकर्म धनञ्जय़ |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
आर्श्यशृङ्गश्च निहतः किमन्यद्भागधेय़तः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
आर्श्यशृङ्गिं कथं चापि सौभद्रः परवीरहा |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं पितुरत्यन्तवैरिणम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं माय़ाविनमरिन्दमम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिं रणे विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिर्महेष्वासो वारय़ामास संय़ुगे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिर्वभौ राजन्दीप्तशृङ्ग इवाचलः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
आर्श्यशृङ्गिस्ततो दृष्ट्वा समरे शत्रुमूर्जितम् |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
आर्ष एष भवेद्धर्मः प्राजापत्योऽथ वासुरः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
आर्षं धर्मं व्रुवाणोऽहं देवय़ानि यथा त्वय़ा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
आर्षं प्रमाणमुत्क्रम्य धर्मानपरिपालय़न् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रमलङ्कृतम् |
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
आर्षभाणि च चर्माणि शतचन्द्राणि भारत |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
आर्षभाणि विचित्राणि रुक्मजालावृतानि च |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
आर्षभे चर्मणी चित्रे प्रगृह्य विपुले शुभे |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
आर्षभे चर्मणी चित्रे शतचन्द्रपरिष्कृते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
आर्षमप्यत्र पश्यन्ति विकर्मस्थस्य यापनम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
इन्द्र उवाच
आर्षो वै शाश्वतो नित्यमव्ययोऽय़ं मय़ा श्रुतः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेः प्राप्य भूय़स्त्वमाश्रमम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेराश्रमं ददृशुस्तदा ||
८९ ख