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भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
आक्षिप्य वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्पथेनाप्ययात्पुनः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
आक्षिप्य शस्त्रेण वलाद्दैत्यानिन्द्र इवावधीत् ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
आक्षेपेण तथैवासेस्त्रिधा रक्तोक्षितोऽभवत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
आखण्डलसखः ख्यातो भक्तो नाराय़णं हरिम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
आखुवभ्रुकवक्त्राश्च मय़ूरवदनास्तथा |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
आख्यातं तप्यमानेन श्रिय़ं दृष्ट्वा तथागताम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेत; द्भूय़श्चेदानीं वद किं ते वदामि ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
इन्द्र उवाच
आख्यातं त्वहमिच्छामि स्वय़मात्मवलं त्वय़ा ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
आख्यातं यत्र पौराणं त्रिपुरस्य निपातनम् ||
१६९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
आख्यातमेतद्भवता गर्भः सञ्जाय़ते यथा |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
आख्यातमेतन्निखिलेन सर्वं; भूय़स्तु किं पृच्छसि राजसिंह ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
आख्यातवन्तस्ते सर्वे निधनं तत्परिक्षितः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय २५४
द्रौपद्यु उवाच
आख्यातव्यं त्वेव सर्वं मुमूर्षो; र्मय़ा तुभ्यं पृष्टय़ा धर्म एषः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
आख्यातव्यं नृपस्यैतत्पृच्छतोऽपृच्छतोऽपि वा |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
आख्यातव्यं मदीय़ानां येऽस्मिञ्जीवन्ति सङ्गरे |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
आख्यातव्यश्च भवता यज्ञोऽय़ं मम सर्वशः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
आख्यातस्ते मय़ा चात्मा दुर्ज्ञेय़ोऽपि सुरासुरैः ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
धृतराष्ट्र उवाच
आख्याता जीवमाना ये परेभ्योऽन्ये यथातथम् |
१०६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
धृतराष्ट्र उवाच
आख्याता मामकास्तात निहता युधि पाण्डवैः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले चेद्विद्यते पुमान् ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
आख्यातारश्च विद्यन्ते पुमांश्चोत्पद्यते कुले ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
आख्यातु रमणीय़ं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
आख्यातुं राक्षसेन्द्राय़ जग्मुस्तत्सर्वमादितः ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
आख्यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
आख्यातुमर्हति भवान्वाय़ोः सर्वं विचेष्टितम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
आख्यानं तदिदमनुत्तमं महार्थं; विन्यस्तं महदिह पर्वसङ्ग्रहेण |
२४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
आख्यानं य इदं युक्तः पठेत्पर्वणि पर्वणि |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
धृतराष्ट्र उवाच
आख्यानपञ्चमैर्वेदैर्भूय़िष्ठं कथ्यते जनः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
आख्यानमखिलं तात सौते प्रीतोऽस्मि तेन ते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मय़ा ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
आख्यानमिन्द्रविजय़ं य इदं निय़तः पठेत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
आख्यास्यन्ति तथैवान्ये इतिहासमिमं भुवि ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
आख्यास्यामि च ते भूय़ः श्राद्धेय़ं विधिमुत्तमम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
आख्यास्ये तत्र पौलोममाख्यानं चादितः परम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
आख्यास्ये ते प्रिय़ं तात महत्पाण्डवनन्दन ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
जनमेजय़ उवाच
आख्याहि तत्त्वमखिलं यथा तपसि सा स्थिता ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो; नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
जनमेजय़ उवाच
आख्याहि मे विस्तरतः कथं राम उपस्थितः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आख्याय़ मां कुशलिनं स्म तेभ्यो; अनामय़ं परिपृच्छेर्जघन्यम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आख्याय़ मां कुशलिनं स्म तेषा; मनामय़ं परिपृच्छेः समग्रान् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आख्याय़ मां कुशलिनं स्म तेषा; मनामय़ं परिपृच्छेर्जघन्यम् ||
३९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
आख्येय़ं तस्य यद्वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् |
१४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव किल्विषात् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
स्त्र्यु उवाच
आगच्छ राजन्पुरतोऽहं गमिष्ये; द्रष्टासि तद्रोदिमि यत्कृतेऽहम् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा ||
३९ ख