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वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
आवर्ततां कार्मुकवेगवाता; हलाय़ुधप्रग्रहणा मधूनाम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादश |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
आवर्तनानि चत्वारि सागरे यात्यसौ नरः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
आवर्तमानमजरं विवर्तनं; षण्णेमिकं द्वादशारं सुपर्व |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
आवर्तमानमावृत्तं युध्यमानं च पाण्डवः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
आवर्तमानान्यभिवर्तमानै; र्वाणैः क्षतान्यद्भुतदर्शनानि |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
आवर्तमानो जातीषु तथान्योन्यासु सत्तम ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
आवर्तय़ कुरूञ्जित्वा पशून्पशुमतां वर |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
आवर्तय़ति भूय़िष्ठं तदेको ह्यनुपालितः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
आवर्तय़ध्वं ह्यनुय़ात शीघ्रं; न दूरय़ातैव हि राजपुत्री ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
आवर्तय़न्ति भूतानि सम्यक्प्रणिहिता च वाक् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
आवर्तय़न्निहन्त्येतत्प्रय़ोक्तारं न संशय़ः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
आवर्तय़ाश्वान्पशवो जितास्ते; याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
आवल्गमानं तं रङ्गे नोपतिष्ठति कश्चन ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
आवल्गितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
आववन्धाद्भुततमं जपन्मन्त्रं यथाविधि ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
आवव्रुः सर्वतो राजन्धर्मपुत्रजय़ैषिणः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
आवव्रुर्जलदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं वहु ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
आवव्रुस्तस्य पन्थानं किरन्तः साय़कान्वहून् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
आवव्रुस्तस्य पन्थानं गजानीकेन दंशिताः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
आवसन्वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
आवहन्त्यनय़ं तीव्रं व्याधय़श्चाप्युपेक्षिताः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
आवहो नाम संवाति द्वितीय़ः श्वसनो नदन् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विरोचन उवाच
आवां कुत्र गमिष्यावः प्राणय़ोर्विपणे कृते |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
आवां पाण्डुसुतान्सङ्ख्ये जेष्याव इति मानदौ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
आवां प्राप्तावतिथी सम्प्रवेशं; काङ्क्षावहे द्वारपते तवाज्ञाम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
आवां भवति वत्स्यावः कञ्चित्कालं हिताय़ ते |
१० क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
आवां वरय़ देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
आवापैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडय़त् |
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्त्वा तपो महत् |
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
आवाभ्यां पुरस्ताद्भवत उपाध्याय़ेनैवमेवाभिष्टुताभ्यामपूपः प्रीताभ्यां दत्तः |
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्पिते ||
३० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
आवाभ्यां सहितः शत्रूञ्श्वोऽसि हन्ता समागमे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आवाभ्यामपि दृष्टस्त्वं श्वेतद्वीपे तपोधन |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय़ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आवामपि च धर्मस्य गृहे जातौ द्विजोत्तम |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ |
७ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वय़ा विभो |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
आवारितस्तु कौन्तेय़स्तव पुत्रेण धन्विना |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
आवार्य चैनं समरे नृवीरा; जघ्नुः शरैः पत्रिभिरुग्रवेगैः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
आवारय़ महावाहो धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् |
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
आवारय़ामास हि शल्य एनं; शस्त्रेण घोरेण सुदुर्जय़ेन ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
आवारय़िष्णूनभिसम्प्रय़ाय़; मुहूर्तमाय़ोध्य वलेन वीरः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
आवासं च सरस्वत्याः स वै व्यासं ददर्श ह ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
आवासमेवोपजगाम शीघ्रं; सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
आवासस्तोय़वान्दुर्गः पर्याकाशः प्रशस्यते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
आवाहाश्च विवाहाश्च यज्ञाश्चान्नमृते तथा |
३३ क