chevron_left  आविष्टःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
आविष्टः कलिना द्यूते जीय़ते स्म नलस्तदा ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किञ्चन ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
आविष्टः स तु कोपेन शशाप नृपतिं तदा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
आविष्टा इव युध्यन्ते पाण्डवाः कुरुभिः सह ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
आविष्टा इव युध्यन्ते रक्षोभूता महावलाः |
८५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
आविष्टा इव शोकेन नाभ्यनन्दन्त किञ्चन |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
आविष्टो दुःखशोकाभ्यां निःश्वसंश्च पुनः पुनः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
आविष्टो रक्षसोग्रेण इय़ेषात्तुं ततः स्म तम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
आवृणोत्तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
आवृण्वन्सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
आवृण्वानं महाज्वालमर्चिर्भिः सर्वतोऽम्वरम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
आवृतं गगनं मेघैर्वलाकापङ्क्तिहासिभिः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
आवृतं तमसा चेतः सर्वेषां स्वर्गवासिनाम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
आवृतं ददृशुर्लोकं हृष्टा वहुविधैर्जनैः ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
आवृतत्वाच्च लोकस्य नासीत्तत्र प्रतिस्वनः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भरद्वाज उवाच
आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसञ्ज्ञितैः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
आवृतानि वरस्त्रीभिर्गृहाणि सुमहान्त्यपि |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
आवृत्तिस्तत्र चैकस्य नास्त्यावृत्तिर्मनीषिणाम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
युधिष्ठिर उवाच
आवृत्ते भगवत्यर्के गन्तासि परमां गतिम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
आवृत्ते भगवत्यर्के स हि लोकान्गमिष्यति |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
आवृत्य गगनं मेघा मुमुचुर्मांसशोणितम् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आवृत्य तु महावाहुर्यतो द्रौणिस्ततो हय़ान् |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
आवृत्य नेय़ेष पुनस्तु युद्धं; पार्थेन सार्धं मतिमान्विमृश्य |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षैरवाकिरन् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
आवेगाद्यत्तु रुधिरं सङ्ग्रामे स्यन्दते भुवि |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
आवेदनीय़ आवेशः सर्वगन्धसुखावहः |
११५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
आवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्ठति योऽचलः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आवेष्टितकरं रौद्रं चतुर्दंष्ट्रं महागजम् ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
आवेष्टय़त तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
आव्रुवाणा समीपस्था चरितान्यस्य लक्षय़ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
नारद उवाच
आवय़ोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
आवय़ोः कृतमन्योन्यं तत्र सन्धिर्न विद्यते |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आवय़ोः क्षीरमित्येव पानार्थमुपनीय़ते ||
७८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
आवय़ोः श्रेष्ठमाचक्ष्व छिन्धि नौ संशय़ं विभो ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
आवय़ोः सहसागच्छद्वदर्याश्रममन्तिकात् |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
आवय़ोरनृतं प्राह यस्तस्याथ द्विजस्य वै |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
आवय़ोरन्तरं पश्य मेरुसर्षपय़ोरिव ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
आवय़ोर्गतमाय़ुश्च कृतकृत्यौ च विद्धि नौ ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आवय़ोर्जीवतो राजन्मय़ि च त्वय़ि च ध्रुवम् |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
आवय़ोर्दृश्यतोरेभिः कथं नु स्यात्समागमः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
आवय़ोर्यत्फलं किञ्चित्सहितं नौ तदस्त्विह ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
आवय़ोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजपुङ्गवाः |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
आवय़ोश्च मिथो भेदे प्रय़तिष्यन्त्यतन्द्रिताः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
आवय़ोश्चिरसन्तापादवेक्ष्य चिरकारिक ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
आवय़ोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ||
९ ख