द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
आशिषः परमाः प्रोच्य स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
आशिषः पाण्डवेय़ेषु प्राय़ुज्यन्त नरेश्वराः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
आशिषस्ता भजन्त्येनं पुरुषं प्राह याः पिता |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
आशिषोऽस्य प्रय़ुञ्जाना हरतो मूषकं विलात् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आशिषोऽय़ुङ्क्त परमा युक्ताः कर्णवधं प्रति ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
आशिष्यते दुःखतरामनर्था; मन्त्यां शय़्यां धार्तराष्ट्रः परासुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
आशीरुक्त्वा यथान्याय़ं पुनर्दर्शनकाङ्क्षिणः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
आशीरेषां भवेद्राज्ञां राष्ट्रं सम्यक्प्रवर्धते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
आशीर्भिरप्यसंय़ुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्भिरभिनन्द्यास्मान्निवर्तध्वं यथागृहम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्भिरभिनन्द्यैनाञ्जग्मुर्नगरमेव हि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
आशीर्भिर्जय़युक्ताभिरानर्चुस्तं महाभुजम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्भिर्वर्धितानस्मान्न पापं प्रसहिष्यति ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्भिर्वर्धय़ित्वा तु तमुवाचास्यतामिति ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
आशीर्युक्तानि कर्माणि हिंसाय़ुक्तानि यानि च |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अगस्त्य उवाच
आशीर्वादस्त्वय़ा प्रोक्तः शपथो वलसूदन |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्वादान्द्विजैरुक्तान्प्रतिगृह्य समन्ततः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्वादान्प्रय़ुञ्जानाः स्वाध्याय़निरता भृशम् ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
आशीर्वादैः परिष्वक्तः सात्यकिः श्रीमतां वरः ||
६० ग
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
आशीर्वादैः स्तूय़मानो दिव्यवादित्रनिस्वनैः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविष इव क्रुद्धः सहदेवो यदाभ्ययात् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
आशीविष इव क्रुद्धः स्तम्भितो मन्त्रतेजसा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
आशीविषं घोरतरं पादेन स्पृशतीह कः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
आशीविषं दृष्टिहरं सुघोर; मिय़ां पुरस्कृत्य वधं जय़ं वा ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
आशीविषः क्रुद्ध इव श्वसन्भृशं; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं कालसृष्टमिवान्तकम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं तस्माद्द्रवति वाहिनी ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन्वाक्यशलाकय़ा ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं तेजोराशिमनिर्जितम् ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं पाण्डवाः पर्यवारय़न् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषवदुच्छ्वस्य धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
आशीविषविदष्टानां सर्पाणामिव भारत ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
आशीविषविषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरं विषम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
आशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
आशीविषसमं युद्धे सर्वशस्त्रविशारदम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
आशीविषसमप्रख्यान्कर्मारपरिमार्जितान् |
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
आशीविषसमप्रख्यौ यमकालान्तकोपमौ ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषसमस्पर्शैः पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
आशीविषसमस्पर्शैः सर्वय़ुद्धविशारदैः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
आशीविषसमान्पार्थान्कोपय़ित्वा क्व यास्यसि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
आशीविषसमेभ्यश्च तेभ्यो रक्षस्व भारत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
आशीविषसमैर्वीरैर्मरुद्भिरिव वृत्रहा ||
८१ ग
आदि पर्व
अध्याय
३७
शृङ्ग्यु उवाच
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यवलचोदितः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
आशीविषस्त्वां सङ्क्रुद्धश्चण्डो दशति दुर्भगे ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
आशीविषस्य क्रुद्धस्य पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् |
१२ क