chevron_left  स्यन्दनंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
स्यन्दनं वृषसेनस्य समारोहन्महारथः ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रय़यौ शीघ्रवाहनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
स्यन्दनेन महार्हेण केतुना वृषभेण च |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि समय़े द्वारकामगात् ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
कीट उवाच
स्यन्दनेषु च काम्वोजा युक्ताः परमवाजिनः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
स्यन्दनैरपविद्धैश्च भग्नचक्राक्षकूवरैः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
स्यन्दनैर्वरवर्णाभैर्भीष्मस्यासन्पुरःसराः ||
२२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
स्यन्देते हि दिवा रुक्मं रात्रौ च द्विजसत्तम |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
स्यातां यस्याहुकाक्रूरौ किं नु दुःखतरं ततः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
स्यात्तु दुर्योधनेनेदमुपांशुविहितं कृतम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
स्यात्तु मद्भाग्यदोषोऽय़ं याहं युष्मानजीजनम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
स्यात्संहितं सद्भिरफल्गुसारं; समेत्य वाक्यं परमानृशंस्यम् ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
स्यादेतत्तु भवेन्मूल्यं किं वान्यन्मन्यते भवान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
स्यादेवमपि कुर्यात्सा विवशा गतसौहृदा |
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
स्यादय़ं व्राह्मणः सोऽथ यो युष्माभिर्विनाशितः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १२७
सोमक उवाच
स्यान्नु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
स्यान्नोऽस्मान्निरय़ान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुय़ा गतिम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
स्यालस्तव महावाहुर्वज्रसंहननो युवा ||
१७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
स्यालस्तव महावीर्यस्ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
स्यालस्तु तव सङ्क्रुद्धो माद्रीपुत्रं हसन्निव |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
स्यालस्य ते महाराज तव पुत्रस्य पश्यतः ||
५६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
स्यालो द्रोणस्य यश्चैको दय़ितो व्राह्मणो महान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
स्यालौ तव महात्मानौ राजानौ वृषकाचलौ |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
स्यालौ तव महाराज राजानौ वृषकाचलौ |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
स्यूमरश्मिरहं व्रह्मञ्जिज्ञासार्थमिहागतः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
स्रंसन्त इव मज्जानस्तावकानां भय़ान्नृप |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
स्रंसन्त इव मज्जानो योधानां भरतर्षभ |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
स्रंसय़ित्वा पुनः कोशं यद्राष्ट्रं पालय़िष्यसि ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्रग्दामपूरितशिखं समग्रेन्दुनिभाननम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
स्रग्दामसमवच्छन्नानुत्तमागुरुगन्धिनः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्रग्धूपगन्धान्यनुलेपनानि; स्नानानि माल्यानि च मानवो यः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
स्रग्धूपपानगन्धानामुभय़त्र समुद्भवः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैः पतितैश्च महाध्वजैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैः पतितैश्च महाध्वजैः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैरनुकर्षैश्च मारिष |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
स्रग्विणो भूषिताश्चान्ये यान्ति चाय़ान्ति चापरे |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
स्रग्विणो भूषिताश्चापि दिव्यमाल्यानुकर्षिणः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
स्रग्विणो मौलिनः सर्वे तथा दिव्यपरिच्छदाः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
स्रग्विणौ वरवस्त्रौ तौ दिव्याभरणभूषितौ ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
स्रग्वी चाक्लिष्टवसनः प्राङ्मुखः प्राञ्जलिः स्थितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
स्रजं चोत्तमगन्धाढ्यां सर्वे च मिथुनं ददुः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद्यौधिष्ठिरीं श्रिय़म् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
स्रजश्च नावकर्षेत न वहिर्धारय़ेत च ||
७५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
स्रजी वज्री वरी चैव विश्वेदेवाः सनातनाः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
स्रजो गन्धानलङ्कारान्वासांसि विविधानि च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
स्रवता रुधिरेणाक्तस्तोत्त्रैर्विद्ध इव द्विपः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
स्रवद्भिः शोणितं गात्रैः प्रस्रुताविव वारणौ |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
स्रवद्व्रणं गैरिकतोय़विस्रवं; गिरेर्यथा वज्रहतं शिरस्तथा ||
२६ ख