chevron_left  आश्वासितोऽहंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासितोऽहं प्राग्वृद्धैर्भवद्भिर्मुनिपुङ्गवैः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
आश्वासितौ वै वसतः सम्प्रहृष्टौ तदा विभो ||
२६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वास्य ताः स्त्रिय़श्चापि मातुलं द्रष्टुमभ्यगात् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वास्य पाय़यित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४४
नकुल उवाच
आश्वासय़ महाराज तामिमां श्रमकर्शिताम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
आश्वासय़ मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वय़ा नलः ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़ सुभद्रां त्वं भगिनीं स्नुषय़ा सह ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़ स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिय़े भृषम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़ंस्तदा धौम्यो वृहस्पतिसमोऽव्रवीत् ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
आश्वासय़ति भर्तारं सोमदत्तमनिन्दिता ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़त्तं महात्मा तदानीं; गच्छन्नूर्ध्वं रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़त्सुहृद्याभिर्वाग्भिस्तत्र धनञ्जय़म् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़दमेय़ात्मा व्यासो लोकनमस्कृतः ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़द्धर्मसुतं युक्तरूपमिवानघ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
आश्वासय़द्भिः सुभृशमनुक्रोशात्तथैव च ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
आश्वासय़न्ती भर्तारमहमन्वगमं वनम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
आश्वासय़न्ती सन्तप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़न्तो राजानं विप्राः शतसहस्रशः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़न्तो विप्राग्र्याः क्षपां सर्वां व्यनोदय़न् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़न्धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्वासय़न्नुवाचेदं वलवद्दानवार्दितम् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़न्पार्षतो भीमसेनं; गदाहस्तं कालमिवान्तकाले ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़न्रथेनैव पाण्डुसैन्यानि सर्वशः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़ामास च तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़ामास च भीतमेनं; भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़ामास तदा साम्ना दामोदरो विभुः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासय़ामास तदा सिञ्चंस्तोय़ेन कौरवम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
आश्विनेय़ौ नरव्याघ्रौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नागभार्यो उवाच
आशय़ा त्वभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
आशय़ा परय़ा प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
आशय़ा सञ्चितं द्रव्यं यत्काले नेह भुज्यते |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
आशय़ा सञ्चितं द्रव्यं यत्काले नोपभुज्यते |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
आशय़ाश्चोदपानाश्च प्रभूतसलिला वराः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
आषाढमेकभक्तेन स्थित्वा मासमतन्द्रितः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवो हरिहणो हरः ||
११७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
आषाढो वाय़ुवेगश्च पूर्वपाली च पार्थिवः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
आषाढो वाय़ुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय २
भीम उवाच
आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि पृच्छतः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
आसंश्च युद्धानि पुरा महान्ति; कथं कर्णो नाभवद्द्वीप एषाम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
आसंश्च सर्वय़ोधानां पातय़न्तो मनांस्युत ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
आसंस्तु पाण्डुपुत्राणां त्रय़ोऽजिह्मा महारथाः |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
आसक्तमनसं दीप्तं प्रतिद्विरदघातिनम् |
८ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
आसक्तमन्यद्वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत् ||
११ ग
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
आसते मधु सम्भृत्य पूर्वमेव निकेतजाः ||
१५ ग
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
आसनं कल्पय़ामास यथा शक्रो वृहस्पतेः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
आसनं च पुरस्कृत्य रत्नानि विविधानि च |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
आसनं चैव पाद्यं च तस्मै दत्त्वा द्विजातय़े |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
आसनं प्राप्य राजा तु मूर्छय़ाभिपरिप्लुतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
आसनं प्रापय़ामासुर्वाष्पकण्ठ्यो वराङ्गनाः ||
४ ख