उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
राज्यं कुरूणामनुपूर्वभोग्यं; क्रमागतो नः कुलधर्म एषः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च; सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं च सर्वं विससर्ज तस्मै; सदण्डकोशं सपुरं महात्मा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं चापहृतं क्षुद्रैराजिहीर्षामहे पुनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनोऽभिशंसति ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रिय़कृत्सुतः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
राज्यं जिहीर्षद्भिरसद्भिरुग्रैः; सर्वं च तद्वो विदितं यथावत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
राज्यं तदेतन्निखिलं पाण्डवानां; पैतामहं पुत्रपौत्रानुगामि ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
देवव्रत उवाच
राज्यं तावत्पूर्वमेव मय़ा त्यक्तं नराधिप |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
राज्यं तिष्ठति दक्षस्य सङ्गृहीतेन्द्रिय़स्य च |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
राज्यं तु पाण्डोरिदमप्रधृष्यं; तस्याद्य पुत्राः प्रभवन्ति नान्ये |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं दातेति मे वुद्धिर्न चेल्लोभान्नशिष्यति ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं धर्मं च कौन्तेय़ विद्वानसि निवोध तत् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं नामेप्सितं स्थानं न शक्यमभिरक्षितुम् ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं निर्द्वन्द्वमव्यग्रं निःसपत्नं चिरं भवेत् ||
७ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं परिददौ सर्वं वैश्यापुत्रे युधिष्ठिरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
राज्यं पुत्रांश्च पौत्रांश्च सुहृदश्चापि सुप्रिय़ान् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
राज्यं पृथिव्यां सर्वस्यामथ वापि त्रिविष्टपे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
राज्यं प्रणिधिमूलं हि मन्त्रसारं प्रचक्षते |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
राज्यं प्रतिप्रदास्यामि युध्यस्व सहकेशवः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
राज्यं प्रशास्तुं हि सुदुर्लभं त्वय़ा; वुभूषता स्वर्ग इवातपस्विना ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
राज्यं प्राणाः प्रिय़ाः पुत्राः सौख्यानि विविधानि च |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
राज्यं प्राप्तमिदं दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं भोक्ष्यसि राजेन्द्र सुखी विगतकल्मषः ||
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं युधिष्ठिरः प्राप्तो वय़ं च गतमन्यवः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
राज्यं राज्यस्य मन्त्रं वा महतीं वा पुनः श्रिय़म् |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
राज्यं वसून्याय़ुधानि भ्रातॄन्मां चासि निर्जितः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
राज्यं वाप्युग्रविभ्रंशं संशय़ो जीवितस्य वा |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं विद्रुतभूय़िष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं वै परमो धर्म इति धर्मविदो विदुः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालय़न् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यं शशास सुमहद्धर्मेण पृथिवीपतिः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
राज्यं शिवीनामृद्धं वै शाधि पक्षिगणार्चित |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
राज्यं श्रिय़ं च तां दीप्तां त्वदर्थं पुरुषर्षभ ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
राज्यं श्रेय़ः परं राजन्यशः कीर्तिं च लप्स्यसे |
२१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनेह धार्यते |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
राज्यं स्फीतं महावाहो स्त्रिय़श्च त्यक्तवान्पुरा ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं हि सततं दुःखमाश्रमाश्च सुदुर्विदाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
राज्यं हि सुमहत्तन्त्रं दुर्धार्यमकृतात्मभिः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतसः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
राज्यकामुकमत्युग्रं स्ववंशोच्छेदकारकम् ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
राज्यनाशं सुहृन्नाशं सुतनाशं च भारत ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यप्रदाने मूढस्य वालिशस्य दुरात्मनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
राज्यप्रेप्सुः सव्यसाची कुरूणां; स्मरन्क्लेशान्द्वादशवर्षवृत्तान् |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
राज्यभाक्स भवेद्व्रह्मन्पुण्यभाक्कीर्तिभाक्तथा |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
राज्यभागी धनिष्ठाय़ां प्राप्नुय़ान्नापदं नरः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
उत्तर उवाच
राज्यमक्षैः पराकीर्य न श्रूय़न्ते कदाचन ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यमप्राप्तवान्पूर्वं स कथं नृपतिर्भवेत् ||
५ ख