वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय़ वै जगत् ||
११४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
आस्ते व्रह्मर्षिभिः सार्धं व्रह्मा देवगणैर्यथा ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
आस्ते शच्या महेन्द्राण्या श्रिय़ा लक्ष्म्या च भारत ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
आस्ते शूली महातेजा नानाभूतगणावृतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
आस्ते सम्वन्धकं कुर्वन्कुरुभिः परिवारितः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्यः सर्वदैवतैः ||
१८६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
आस्ते स्म सलिले मग्नः प्रमृतांश्च विमुञ्चति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा क्रीडन्निव महाभुजः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
आस्तेऽत्र भगवान्कृष्णस्तत्कान्त्या श्यामतां गतः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
आस्था तु त्वय़ि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
आस्थास्यति पुनर्भैमी दमय़न्ती स्वय़ंवरम् ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
२११
अर्जुन उवाच
आस्थास्यामि तथा सर्वं यदि शक्यं नरेण तत् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ कौशिकान्मार्गानुत्पतन्स पुनः पुनः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ तं काञ्चनरत्नचित्रं; रथोत्तमं सिंह इवोन्ननाद |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्महाजवैः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ पुरुषव्याघ्रः स्ववलेनाभिसंवृतः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
आस्थाय़ मृगरूपं वै खमेवाभ्यपतत्तदा ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ यानानि महान्ति तानि; कुन्ती च कृष्णा च सहैव याते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ रथशार्दूलाः शीघ्रमेव यय़ुस्ततः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ रुचिरं जिष्णो रथं सारथिना मय़ा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्थाय़ रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ रूपं विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
आस्थाय़ विपुलं वीर रथं सारथिना मय़ा |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्थाय़ विरुवन्त्युग्राः कम्पय़न्त्यो मनो मम ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थाय़ वीराः सहिता वनाय़; प्रतस्थिरे भूतपतिप्रकाशाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ सुमहानागं प्रभिन्नं पर्वतोपमम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ाश्वतरीय़ुक्तान्स्यन्दनानपरे जनाः |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
आस्थाय़ास्वर्ग्यमध्वानं सहाय़ान्विषमे त्यजन् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
आस्थितं परमं मार्गमक्षय़ं तमनामय़म् ||
५० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थितं पाण्डवेय़ाभ्यां यदूनामृषभेण च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
आस्थितः परमं यत्नं न समृद्धं च तत्तव ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
आस्थितः परमं योगमृषिः पुत्रार्थमुद्यतः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
आस्थितः प्रवभौ राजन्दीप्यमान इवांशुमान् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
आस्थितः शुशुभे राजन्नंशुमानुदय़े यथा ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
आस्थितः स रथश्रेष्ठं कर्णः शरगभस्तिमान् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
आस्थितः समरे राजन्मेघस्थ इव भानुमान् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
व्राह्मण उवाच
आस्थितः सुमहाभागो यय़ौ सिद्धिं च दुर्गमाम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
आस्थितश्चक्रमुद्यम्य द्रोणं क्रुद्धोऽभ्यधावत ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
आस्थितस्तमहं मार्गमसूय़िष्यामि कं कथम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
आस्थिता वहुभिर्म्लेच्छैर्युद्धशौण्डैः प्रहारिभिः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
आस्थिताः कृतवर्माणो भद्रा नित्यमदा द्विपाः |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आस्थिताभ्यां सर्वकृच्छ्रं व्रतं सम्यक्तदुत्तमम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
आस्थितो दिव्यमध्वानं पावकार्कसमप्रभः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
आस्थितो युगपद्भावे व्यवहारः स लौकिकः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आस्थितो रौद्रमात्मानं जघान समरे परान् ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
आस्थीय़तां जय़े योगो धर्ममुत्सृज्य पाण्डव |
६८ क