उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
आस्थेय़ं हि हितं तेन न द्रोग्धा गुरुरुच्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
आस्फोटय़त लाङ्गूलमिन्द्राशनिसमस्वनम् ||
६० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
आस्फोटय़त्तदाकाशे धर्मः प्राप्तो मय़ेति वै ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
आस्फोटय़ामास भृशं भीमसेनो ननर्त च ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
आस्यं विवृत्य ककुदी पाणिं सम्प्राक्षिपच्छनैः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
आस्यं हि पाय़ुसंय़ुक्तमन्ते स्याद्गुदसञ्ज्ञितम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
कुलपतिरु उवाच
आस्यतां यदि ते वुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
आस्यतां रुचिरं छन्दः किं वा कार्यं व्रवीहि मे ||
६८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आस्यतामिति चोवाच प्रसन्नात्मा महामुनिः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
आस्यतामिति राजेन्द्र व्राह्मणच्छद्मसंवृतान् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
आस्यतामित्यथोचुस्ते व्रूहि किं करवामहे ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्यात्सुगन्धि तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
आस्यादेष निःसरते नराणां; क्रोधः प्रमादो मोहरूपश्च मृत्युः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
आस्याद्ग्रासमिवाक्षिप्तं ममृषे नार्जुनात्मजः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्याद्वमन्पावकं स संवर्तकसमं तदा |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
आस्याद्विनिःसृता जिह्वा भक्ष्यते कृष्ण पक्षिभिः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगय़ते मुनिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरं भगवंस्तव |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
आस्रवत्यपि मामन्नं पुनर्वहुगुणं वहु |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
७
भीम उवाच
आस्वादिता ये नृपते पुराभव; न्युधिष्ठिरेणापि नृपेण सर्वशः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
आस्वाद्य चास्वाद्य च वीक्षमाणः; क्रुद्धोऽतिवेलं प्रजगाद वाक्यम् ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मय़ा ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
आस्स्व व्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तमिति सान्त्वय़न् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
आह चैनम् |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
आह चैनम् |
११९ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
आह त्वां राघवो राजन्कोसलेन्द्रो महाय़शाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
आह मां तत्र देवेशो गच्छ पाण्डुसुतानिति |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेऽग्र्यं भविष्यति ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
आह मां भगवानीशः प्रहसन्निव शङ्करः ||
१७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
आह मां भगवानेवं शिखण्डी शिवविग्रहः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
आह माममरश्रेष्ठः पिता तव शतक्रतुः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
आह शौनक देवेन्द्रः सर्वभूतहितः प्रभुः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
आह सत्यवती हृष्टा दिष्ट्या पुत्र जितं त्वय़ा ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
आहतस्तु तदा भीमस्तव पुत्रेण भारत |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
आहता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
आहतानि व्यशीर्यन्त भीमसेनस्य पत्रिभिः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
आहतुः पार्थिवश्रेष्ठं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
आहतुश्चैनम् |
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
आहतुस्तात तत्सत्यमजेय़ौ कृष्णपाण्डवौ ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
आहतुस्त्वां हितं वाक्यं तदादत्स्व परन्तप ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्खं प्रध्माय़ चासकृत् ||
६३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
आहनद्भरतश्रेष्ठ भीमं वैकर्तनः शरैः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
आहर त्वं मम कृते यथान्याय़ं यथाक्रमम् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
आहरन्क्रतुमुख्येऽस्मिन्कुन्तीपुत्राय़ भूरिशः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आहरन्ति नरश्रेष्ठास्तेषां लोकेष्वपश्यत ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आहरन्ति महाप्राज्ञास्तेषां लोकेष्वपश्यत ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
कीचक उवाच
आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
आहरन्न लभे तस्मात्प्रसादं द्विजसत्तमात् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
आहरामि तवाद्याहं निष्कादीन्यजिनानि च |
३ क