वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वशुरो वालिनः श्रीमान्सुषेणो राममभ्ययात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वश्रूभ्यां समनुज्ञाताः परिष्वज्याभिनन्दिताः |
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वश्रूश्वशुरभर्तॄणां मम पुण्यास्तु शर्वरी ||
९६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
श्वश्रूश्वशुरय़ोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वश्रूश्वशुरय़ोः पादाञ्शुश्रूषन्ती वने त्वहम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
श्वश्रूश्वशुरय़ोः पादौ तोषय़न्ती गुणान्विता |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
श्वश्रूश्वशुरय़ोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अरुन्धत्यु उवाच
श्वश्र्वापवादं वदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
श्वश्र्वास्तद्वचनं श्रुत्वा शय़ाना शय़ने शुभे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
श्वसतां च शृणोम्येवं गोपुत्राणां प्रचोद्यताम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
श्वसन्त्यौ नागकन्येव ससृजाते विभावसुम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
श्वसमानो यथा नागः प्रणुन्नो वै शलाकय़ा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
श्वसित्याभाषते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वस्ते सर्वं यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज ||
७१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
श्वस्त्वहं तस्य सङ्कल्पं सर्वं हन्ता महीपते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वा चरन्स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान् ||
१७ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वा चैवानुय़यावेकः पाण्डवान्प्रस्थितान्वने |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वा ततो जाय़ते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
श्वा ते निदर्शनं तात किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपी व्याघ्रत्वमागतः |
४१ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वा त्वेकोऽनुय़यौ यस्ते वहुशः कीर्तितो मय़ा ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वा भूत्वा चाथ षण्मासांस्ततो जाय़ति मानुषः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वा भूत्वा पञ्च वर्षाणि ततो जाय़ति मानुषः ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वा वर्षमेकं भवति ततो जाय़ति मानवः ||
४४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
श्वा श्वानं हन्ति दाशार्ह पश्य धर्मो यथागतः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वा सृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को वकस्तथा ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
श्वा हुताशसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे ||
७ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु; त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुह्यसेऽद्य ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्णं हरिणं कृशम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
श्वानः काकाश्च गृध्राश्च वृका गोमाय़ुभिः सह |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
श्वानलोमापनय़ने तीर्थे भरतसत्तम |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
श्वानश्च पङ्क्तिदूषाश्च नावेक्षेरन्कथञ्चन |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
श्वानश्च विविधैर्नादैर्भषन्तस्तत्र तस्थिरे ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
श्वानो भीषणाय़ोमुखानि वय़ांसि; वडगृध्रकुलपक्षिणां च सङ्घाः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
श्वापदांश्च वहून्घोरांश्छत्राणि विविधानि च |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
श्वापदानि दरिद्रांश्च प्राय़ो नार्ता भवन्ति ते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
श्वापदैर्भक्ष्यमाणं त्वमहो दिष्ट्या न पश्यसि |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
श्वापदैर्भक्ष्यमाणस्य शोभय़न्तीव मूर्धजान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वापदो दश वर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पञ्च च ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
श्वार्थमत्यन्तसन्दुष्टः क्रूरः काल इवान्तकः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
श्वाविच्छल्यकगोधानां खरैडकगवां तथा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
श्वाविद्गोधावराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
श्वाविधाविव राजेन्द्र व्यदृष्येतां शरक्षतौ ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
श्वित्रिणां च कुले जातां त्रय़ाणां मनुजेश्वर ||
१२६ ख