आदि पर्व
अध्याय
३४
देवा ऊचुः
का हि लव्ध्वा प्रिय़ान्पुत्राञ्शपेदेवं पितामह |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
का हि सर्वेषु लोकेषु विश्रुताभिजनं नृपम् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
कां गतिं नु गमिष्यामि त्वय़ा हीना जनेश्वर |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
कां तु व्राह्मणपूजाय़ां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि; पतिं वृणीष्व यमिहान्यमिच्छसि ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
कां दिशं प्रतिपत्स्यामः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीनः शत्रुवशं गतः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
शुक उवाच
कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
कां देवतां नु यजतः पितॄन्वा कान्महामती ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
कां नु वाचं सञ्जय़ मे शृणोषि; युद्धैषिणीं येन युद्धाद्विभेषि |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
युधिष्ठिर उवाच
कां योनिं प्रतिपन्नास्ते तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
कां वा वुद्धिं विनिश्चित्य सर्वो वै विषय़स्तव |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
कां वा व्राह्मणपूजाय़ां व्युष्टिं दृष्ट्वा महाव्रत |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
कां वुद्धिं समनुध्याय़ शान्तश्चरसि निर्वृतः ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
कांश्च प्रमथ्याधिरथिर्युधिष्ठिरमपीडय़त् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कांश्चिच्छकुनजातांश्च विटपेषूत्कटानपि |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
कांश्चिदभ्यवदत्प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान् |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कांश्चिदापततो वीरानपरांश्च प्रधावतः |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
कांश्चिदुद्वहतो वाणान्रथशक्तिगदास्तथा ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
कांश्चिदेणान्स निर्जघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कांश्चिद्योधान्स खड्गेन मध्ये सञ्छिद्य वीर्यवान् |
१०६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कांश्चिद्विभेद पार्श्वेषु कालसृष्ट इवान्तकः ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
कांस्तत्र सञ्जय़ापश्यः प्रत्यर्थेन समागतान् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
कांस्यं हृत्वा तु दुर्वुद्धिर्हारीतो जाय़ते नरः |
९९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
कांस्याय़सतनुत्रांस्तान्नरानश्वांश्च पाण्डवः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
कांस्याय़सतनुत्राणान्नराश्वरथकुञ्जरान् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रय़च्छति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
जनमेजय़ उवाच
काः कथाः समवर्तन्त तस्मिन्वीरसमागमे |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ||
५१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
काकवक्त्राः प्लवमुखाः शुकवक्त्रास्तथैव च |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
काका इव महानागं मा वै हन्युर्यतव्रतम् ||
२७ ग
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
काकी च हलिमा चैव रुद्राथ वृहली तथा |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
काकीं श्येनीं च भासीं च धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
काकुदीकं शुकं नाकमक्षिसन्तर्जनं तथा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
काकेन वडिशेनेमामतार्षं त्वामहं नदीम् ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
काकेनेमांश्चित्रवर्हाञ्शार्दूलान्क्रोष्टुकेन च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
काकैरिमांश्चित्रवर्हान्मय़ूरा; न्पराजैष्ठाः पाण्डवान्धार्तराष्ट्रैः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
काको दृढं परिश्रान्तः सहसा निपपात ह ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
काको भूत्वा निपतने समाह्वय़सि दुर्मते |
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
काको वहूनामभवदुच्चिष्टकृतभोजनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
काकोल इव कृष्णाङ्गो रूक्षः पापसमाहितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
काक्षीवदादीन्पुत्रांस्तान्दृष्ट्वा सर्वानधीय़तः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
काङ्क्षता परलोकं च धर्मराजस्य च प्रिय़म् ||
७२ ग
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
काङ्क्षतां विपुलां कीर्तिं वैरं प्रतिचिकीर्षताम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
काङ्क्षते ज्ञातिसौहार्दाद्वलवान्दुर्वलो यथा ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
काङ्क्षन्तं दर्शनं कुन्त्या गान्धार्याः श्वशुरस्य च ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः |
१२ क