chevron_left  आगस्कारिणमत्यर्थंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम् |
१०९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
आगस्कृतमिवात्मानं मेने चाधिरथिस्तदा |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
सञ्जय़ उवाच
आगस्कृत्सर्वलोकस्य पुत्रस्ते भरतर्षभ ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
आगस्कृत्सर्वलोकस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
आगस्कृत्सर्वलोकस्य पृथिवीनाशकारकः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
आगस्कृत्सर्ववीराणां वैरी सर्वमहीभृताम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् |
११४ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
आगस्त्याश्च महाभागा आत्रेय़ाश्चोत्तमव्रताः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
आगामिनं महावुद्धिः स्ववंशे मुनिपुङ्गवः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
आगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णश्च सारणः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ं चापि सौम्यं च ससर्ज कुरुनन्दनः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
आग्नेय़ं वारुणं सौम्यं वाय़व्यमथ वैष्णवम् |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
आग्नेय़ं वै लोहितमालभन्तां; वैश्वदेवं वहुरूपं विराजन् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ः कृत्तिकापुत्रो रौद्रो गाङ्गेय़ इत्यपि |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
आग्नेय़मस्त्रं दुर्धर्षं चक्रं लेभे महावलः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़मस्त्रं दय़ितं स च कल्योऽभवत्तदा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
आग्नेय़मस्त्रं दय़ितं सर्वसाहं महाप्रभम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
आग्नेय़मानय़न्नित्यमाह्वानेष्वेष कथ्यते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़मिति तत्कार्यमिति चान्ये च मानवाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
आग्नेय़स्त्वङ्गिराः श्रीमान्कविर्व्राह्मो महाय़शाः |
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ानि च सर्वाणि वाय़व्यानि तथैव च |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ान्युत सन्तीह तानि सर्वाणि दापय़ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ेनार्जुनः सङ्ख्ये गन्धर्वाणां वलोत्कटः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
आग्नेय़ेनासृजद्वह्निं वारुणेनासृजत्पय़ः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
आघातनी गर्हितैषा पतन्ती; तेषां प्रेतान्पातय़ेद्देवय़ानात् ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
आघारौ समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदुः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
आघोषितं च नगरे न पातव्या सुरेति ह |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
आघ्रातश्च तथा मूर्ध्नि श्रावितश्चाशिषः शुभाः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
आघ्राय़ मानुषं गन्धं भगिनीमिदमव्रवीत् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
अलर्क उवाच
आघ्राय़ सुवहून्गन्धांस्तानेव प्रतिगृध्यति |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
द्रोण उवाच
आचक्षध्वं च भीष्माय़ रूपेण च गुणैश्च माम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्षध्वं पुरं गत्वा सङ्ग्रामे विजय़ं मम ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
जनमेजय़ उवाच
आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा तन्नः स्यात्सुमहद्भय़म् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
आचक्षे ते प्रिय़ं पार्थ तदेवं भरतर्षभ |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्षे ते महाप्राज्ञ देवय़ानी वने हता |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
आचक्षे ते महाराज यदकार्षीत्पितामहः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्षे वो दानवा वालिशाः स्थ; सिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
आचक्षेथाः सर्वमिदं मां च मुक्तं महाहवात् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
आचक्षेऽहं मनुष्येभ्यो देवेभ्यः प्रतिसञ्चरन् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व कृष्ण सौभद्रवधमित्यपतद्भुवि ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व तद्धि नः सर्वं कुशलो ह्यसि सञ्जय़ |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व न हि नो व्रह्मन्रोचते तमृतेऽर्जुनम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
आचक्ष्व नः कर्मफलं महर्षे; कथं पापं नुदते पुण्यशीलः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व पाण्डवेय़ानां मामकानां च सर्वशः ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
आचक्ष्व भगवन्नेतद्यथा विद्यामहं तथा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
आचक्ष्व भद्रे भर्तुस्त्वं सर्वमेव विचेष्टितम् |
८ क