अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
इक्षुभिः सन्ततां भूमिं यवगोधूमसङ्कुलाम् |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
इक्षुवर्धनिका चैव तथा भरतसत्तम ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय
१९०
राजो उवाच
इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं; न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
इक्ष्वाकवो यदि व्रह्मन्दलो वा; विधेय़ा मे यदि वान्ये विशोऽपि |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रिय़ं; निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान्मित्रं चैव भविष्यति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
इक्ष्वाकुरगमत्तत्र समेता यत्र ते विभो ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
इक्ष्वाकुरस्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमव्रवीत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
इक्ष्वाकुराज्ञः सुवलस्य पुत्रः; स एष हन्ता द्विषतां सुगात्रि ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसासदृशो भुवि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
इक्ष्वाकुवंशजस्तस्माद्धरिणाश्वः प्रतापवान् |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो ददतां वरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो युवनाश्वो महीपतिः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजासीत्पृथिवीपतिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
राजो उवाच
इक्ष्वाकूणां तु येनाहमनृणः स्यां द्विजोत्तम |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
इक्ष्वाकोः सूर्यपुत्रस्य यद्वृत्तं व्राह्मणस्य च ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
इक्ष्वाकौ संस्थिते राजञ्शशादः पृथिवीमिमाम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
इङ्गितज्ञः कविः क्षिप्रमन्ववुध्यत सात्यकिः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
इङ्गितज्ञास्ततो भर्तुश्चत्वारो रजनीचराः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्राय़ानविशारदम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
इङ्गितेन तु तज्ज्ञात्वा गाङ्गेय़ेन विचिन्तितम् |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
इङ्गितेनैव दाशार्हस्तमभिप्राय़मादितः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
इङ्गुदान्करवीरांश्च तिन्दुकांश्च महाफलान् |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
इङ्गुदैरण्डतैलानां स्नेहार्थं च निषेवणम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
इङ्गुदैर्वदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
सत्यवत्यु उवाच
इच्छँल्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनर्मम |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
इच्छतः सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशय़म् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
इच्छतस्ते न मुच्येत चक्षुःप्राप्तो रणे रिपुः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छता तेन न हतो राजेत्यपि च ते विदुः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
इच्छतां पार्थिवेन्द्राणां भीष्म जीवस्यसंशय़म् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
इच्छति ध्याय़ति द्वेष्टि वाचमीरय़ते च कः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
दुर्योधन उवाच
इच्छतो न हि ते मुच्येत्क्रुद्धस्यापि पुरन्दरः ||
३१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
इच्छतोपेक्षितो नाशः कुरूणां मधुसूदन |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इच्छतोर्हि द्वय़ोर्लाभः स्त्रीपुंसोरमृतोपमः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
कन्यो उवाच
इच्छत्येनं दैत्यसेना न त्वहं पाकशासन ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
इच्छद्भिः परमं श्रेय़ इह चामुत्र चोत्तमम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
इच्छन्तस्ते विहाराय़ सुखं महदवाप्नुय़ुः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तुं प्रेत्य चेह च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
इच्छन्ति पुत्रं पुरुषा लोके नान्यं कथञ्चन ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छन्ति वहुलं सन्तः प्रतिकर्तुं महत्प्रिय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
इच्छन्तो निधनं युद्धे शस्त्रैरुत्तमतेजसः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
इच्छन्तो निधनं युद्धे स्वर्गं कृत्वा पराय़णम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
इच्छन्नपचितिं कर्तुं भृगूणां भृगुसत्तमः |
११ क