शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छामि भगवंस्त्वत्तः सर्वं यथातथम् |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छामि भगवन्यदि दृष्टस्त्वय़ा नृपः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छामि भगवन्विस्तरेण महामुने |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रोतुमिच्छामि भगवन्स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
शौनक उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण कथामेतां मनोरमाम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तस्तं मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
युधिष्ठिर उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव तवैतच्छापकारणम् ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
जनमेजय़ उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं व्रह्मन्परं कौतूहलं हि मे ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं तेषामङ्गविचेष्टितम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
जनमेजय़ उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं विस्तरेण तपोधन |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
दुर्योधन उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वैः सहैभिर्वसुधाधिपैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
श्रोत्रं खतो घ्राणमथो पृथिव्या; स्तेजोमय़ं रूपमथो विपाकः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रिय़सञ्ज्ञिताः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
श्रोत्रं घ्राणमथास्यं च हृदय़ं कोष्ठमेव च |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं पञ्चेन्द्रिय़ाण्यपि |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणमेव च पञ्चमम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
श्रोत्रं शव्दगुणं चैव चक्षुरग्नेर्गुणस्तथा |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रोत्रमध्यात्ममित्याहुर्यथाश्रुतिनिदर्शनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चाप्यधिष्ठितान् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रोत्ररम्यान्सुमधुराञ्शव्दान्खगमुखेरितान् ||
३८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
श्रोत्रस्थाश्च दिशः सर्वाः शव्दज्ञाने प्रकीर्तिताः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
श्रोत्रादिय़ुक्तः सुमनाः सुवुद्धि; र्लिङ्गात्तथा गच्छति लिङ्गमन्यत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
श्रोत्रादीनि तु सर्वाणि पञ्च कर्मेन्द्रिय़ाणि च |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
श्रोत्रादीनि न पश्यन्ति स्वं स्वमात्मानमात्मना |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
श्रोत्रादीनीन्द्रिय़ाण्यन्ये संय़माग्निषु जुह्वति |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्वुद्धिय़ुक्तानि तत्त्वतः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
श्रोत्रिय़त्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
श्रोत्रिय़स्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
श्रोत्रिय़स्येव ते राजन्मन्दकस्याविपश्चितः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
श्रोत्रिय़स्येव ते राजन्मन्दकस्याविपश्चितः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
श्रोत्रिय़ांश्च विकर्मस्थान्प्राज्ञांश्चाप्यजितेन्द्रिय़ान् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
श्रोत्रिय़ान्व्राह्मणान्वृद्धान्नित्यमेवाभिपूजय़ेत् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
श्रोत्रिय़ास्त्वग्रभोक्तारो धर्मनित्याः सनातनाः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
श्रोत्रिय़ो वार्धुषी भूत्वा चिररात्राय़ नश्यति |
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
शकुनिरु उवाच
श्रोत्रिय़ोऽश्रोत्रिय़मुत निकृत्यैव युधिष्ठिर |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
श्रोत्रेण गन्धमादत्स्व निष्ठामादत्स्व जिह्वय़ा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
श्रोत्रेण गृह्यते शव्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
श्रोत्रेण श्रवणं चैव चक्षुषा चैव दर्शनम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
श्रोत्रेण श्रूय़ते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
श्रोष्यथ भ्रष्टविज्ञानास्ततः सर्वे विनङ्क्ष्यथ ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान्भजिष्यति |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२
ऋषिरु उवाच
श्रोष्यसि त्वं रुरो सर्वमास्तीकचरितं महत् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोष्यामि तानि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् |
७२ क