आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़ा व्रूहि सत्यं त्वं सत्यं राजसु शोभते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
पुरोहित उवाच
कामय़ा शापितो राजन्नान्यथा वक्तुमर्हसि ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
कामय़ाना महत्स्थानं तस्माद्दानात्परो दमः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़ानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़ामासतुस्तौ तु परस्परमिति श्रुतिः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
कामय़िष्यामि कामार्तं तासां रूपेण मोहितम् |
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
नकुल उवाच
कामय़े काम्यके वासं नेदानीममरोपमम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
कामय़े दर्शनं पित्रोर्याहि सावित्रि माचिरम् |
९८ क
वन पर्व
अध्याय
४१
अर्जुन उवाच
कामय़े दिव्यमस्त्रं तद्घोरं पाशुपतं प्रभो ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
कामय़े समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़ोगात्प्रवर्तेरन्न पार्था दुःखमाप्नुय़ुः ||
६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं किं नु तद्राजन्यत्कृष्णा पतिता भुवि ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
अर्जुन उवाच
कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै संनिय़ोजिता ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
जनमेजय़ उवाच
कारणं कीर्तितं व्रह्मञ्शार्ङ्गकानां न कीर्तितम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
कारणं च महाराज शृणु येनेदमिष्यते ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं चैव तत्तेषामाचचक्षे तपस्विनाम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
युधिष्ठिर उवाच
कारणं तत्र मे व्रूहि सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
कारणं तस्य देहोऽय़ं धातुः कर्मणि कर्मणि |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
कारणं तस्य देहोऽय़ं स कर्ता सर्वकर्मणाम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
कारणं तु प्रवक्ष्यामि यथा ख्यातौ तु तत्त्वतः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
कारणं नाधिगच्छामि कथञ्चिदपि चिन्तय़न् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
कारणं परमं प्राप्य अतिक्रान्तस्य कार्यताम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
कारणं पुरुषो येषां प्रधानं चापि कारणम् |
८२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
कारणं प्राप्य तु नराः सर्व एव महाभुजाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
कारणं भरतश्रेष्ठ पाण्डवानां जय़ं प्रति |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कारणं भावितं तस्य सर्वमुक्तस्य सर्वतः |
१५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
कारणं यदि न स्याद्वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
कारणं लोभमोहौ तु दोषाणां च निषेवणम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुय़ोगं समासतः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
कारणं वलमेवेह जनाञ्शोचामि दुर्वलान् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात्त्वमपि किल्विषी ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं व्रूहि कल्याणि किमर्थं ते ह्रदो ह्ययम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
अर्जुन उवाच
कारणं व्रूहि गन्धर्व किं तद्येन स्म धर्षिताः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
कारणं व्रूहि धर्मात्मन्योऽस्मय़िष्ठाः कुतश्च ते |
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं व्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महद्भय़म् |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कारणं श्रुतमस्माभिः शापश्चैव श्रुतोऽनघे |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
कारणं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
कारणद्वय़मास्थाय़ नाहं योत्स्यामि पाण्डवैः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
कारणद्वय़मेतद्धि जानानस्त्वाहमव्रुवम् |
९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
कारणस्य च कर्तुश्च गुणदोषास्तथैव च ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
कारणस्य तु दौर्वल्याच्चिन्तय़ामि महामुने |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कारणात्प्रिय़तामेति द्वेष्यो भवति कारणात् |
१४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
कारणाद्देशकालस्य देशकालः स तादृशः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
कारणाद्धर्ममन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् ||
४९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
कारणान्तरय़ोगेन योगे येषां समा मतिः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
कारणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ||
८१ ग