आदि पर्व
अध्याय
८०
यय़ातिरु उवाच
शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वय़म् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
शुक्रो नामासितः पादो यस्य वारिधरोऽम्वरे |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
शुक्रो वरेण्यश्च विभुः सवनश्चेति सप्त ते |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शुक्रो वाय़ुः पृष्ठतः पाण्डवानां; धार्तराष्ट्राञ्श्वापदा व्याभषन्त |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
शुक्रो वृहस्पतिर्भौमो वुधो राहुः शनैश्चरः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
शुक्रो वृहस्पतिश्चैव वुधोऽङ्गारक एव च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां; स्तथागस्त्यो नारदपर्वतौ च |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
शुक्लं च रोचमानं च सिंहसेनं च दुर्जय़म् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तो नीलः पीतोऽरुणस्तथा |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
शुक्लः शुक्लाभिजातीय़ः साध्यो नावर्ततेऽनघ |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो विभर्ति हुताशनम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शुक्लध्वजमनाधृष्यं शुक्लय़ज्ञोपवीतिनम् ||
११७ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
शुक्लपक्षे दशम्यां तु पुण्डरीकं समाविशेत् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
शुक्लपक्षे पिवन्त्येके यवागूं क्वथितां सकृत् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शुक्लभस्मावलिप्ताय़ शुक्लकर्मरताय़ च ||
१५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
शुक्ललोहितकृष्णानि रूपाण्येतानि त्रीणि तु |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शुक्लवर्णाय़ शुक्लाय़ शुक्लाम्वरधराय़ च |
१५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
शुक्लस्त्वं वहुलश्चैव कला काष्ठा त्रुटिस्तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
शुक्लस्य वर्णस्य परा गतिर्या; त्रीण्येव रुद्धानि महानुभाव ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्ला वदान्या ह्रीमन्त आर्याः पुण्याभिजातय़ः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
शुक्लानां तु सहस्रेण वाजिनां रथमुत्तमम् |
८८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
शुक्लाभिजनकर्माणो मतिमन्तो जनाधिपाः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे सुप्रिय़दर्शनाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
शुक्लाम्वरधरं देवं शुक्लमाल्यानुलेपनम् |
११७ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्ले दशोत्तरे पक्षे तारापतिरिवाम्वरे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्ले देवान्पितॄन्कृष्णे तर्पय़त्यमृतेन यः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
शुचा परमय़ा युक्तश्चिन्तय़ानः पराजय़म् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
शुचि नित्यमनाय़ासं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
शुचिः शीलगुणोपेतस्तेजस्वी वीर्यवान्वली ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिः शुचिषदं हंसं तत्परः परमेष्ठिनम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
शुचिकर्मा शुचिश्चैव भवत्यमितदीप्तिमान् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
शुचिकाममनड्वाहं देवगोष्ठं चतुष्पथम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिकालीय़कादिग्धं मुख्यस्नानाधिवासितम् |
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिमाप्तं प्रिय़ं चैव सदा च दृढभक्तिकम् |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिरेकमनाः सार्धमृषिभिस्तैरुपाविशत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
शुचिर्दक्षो गुणोपेतो व्रूय़ादिषुरिवात्वरः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
शुचिर्द्विजो राजपुरोहितस्तदा; तथैव ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिर्भूत्वा महादेवं गतवाञ्शरणं नृप ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानय़त् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
शुचिशुक्रागमे काले शुष्ये तोय़मिवाल्पकम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
शुचिश्रवा हृषीकेशो घृतार्चिर्हंस उच्यसे |
७ क