मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवमुक्त्वा वचनं सुधर्मां यादवीं सभाम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो; दुर्योधनः शोकपरीतचेताः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा वीभत्सुर्देवदत्तमथाधमत् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवमुक्त्वा स महाधनुष्मा; न्हित्वा सभां स्वं भवनं जगाम |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवमुक्त्वा सङ्क्रुद्धो वज्रदत्तो नराधिपः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात; राजा ततस्तच्छय़नं विहाय़ |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वानुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां वरम् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुच्चरन्त्यः स्म श्रूय़न्ते विविधा गिरः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुच्चै राजेन्द्र भाषमाणं वृकोदरम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
इत्येष क्षत्रधर्मस्य मय़ा मार्गोऽनुदर्शितः |
१९४ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
इत्येष दण्डो विख्यात आदौ मध्ये तथावरे |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येष पूरोर्वंशस्तु पाण्डवानां च कीर्तितः |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येष प्रथमः कल्पो व्याख्यातस्ते सुविस्तरः |
८६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
इत्येष लक्षणोद्देशः प्रोक्तो नक्षत्रय़ोगतः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मय़ा |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येष वंशप्रभवः कथितस्ते तरस्विनाम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मय़ा |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसञ्ज्ञकः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसञ्ज्ञकः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
इत्येषा पुरुषश्रेष्ठ श्राद्धोत्पत्तिर्यथागमम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
इत्येषा भावजा वुद्धिः कथिता ते न संशय़ः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
इत्येषा मे मती राजन्यथा वा मन्यसेऽनघ |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
इत्येषां निश्चय़ो ह्यासीत्तत्कालममितौजसाम् ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
इदं करिष्ये भगवन्निदं चापि कृतं मय़ा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेकः कथञ्चन |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
इदं कष्टतरं चान्यद्भगवन्प्रतिभाति मे |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
इदं कापव्यचरितं यो नित्यमनुकीर्तय़ेत् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
इदं कार्यममृताशाः शृणोमि; तपो दमः सत्यमात्माभिगुप्तिः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
इदं कृच्छ्रतरं पश्य पुत्रस्यापि वधान्मम |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
इदं कृतय़ुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तते |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
ऋषय़ ऊचुः
इदं कृतय़ुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
इदं खलु महाराज श्रुतमासीत्पुरातनम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
इदं घोरमिदं चित्रमिदं रौद्रमिति प्रभो |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
इदं च तच्चापि समीक्ष्य नूनं; पराजय़ो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च तत्राद्भुतरूपमुत्तमं; जगाद विप्रर्षिरतीतमानुषम् |
१४ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च तदनुप्राप्तमव्रवीद्यद्युधिष्ठिरः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
इदं च त्वां सर्वपरं व्रवीमि; पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
इदं च दृष्टं जगता सह त्वय़ा; कृतं यदेकेन किरीटमालिना |
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
इदं च परितप्यामि पुनः पुनरहं सुराः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च भूय़ो वक्ष्यामि सभामध्ये वृहद्वचः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
इदं च मामव्रवीद्धर्मराजः; पुनः पुनः सम्प्रहृष्टो द्विजर्षे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
इदं च मे तनुत्राणं प्राय़च्छन्मघवान्प्रभुः |
४ क