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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीञ्जीवय़ेथा मृतानिमान् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि वहुधात्मनः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
इच्छन्नार्यः सर्वभूतानि कुर्या; द्वशे वशी सर्वसमाप्तविद्यः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
इच्छन्नेष तपोवीर्यादन्याँल्लोकान्सृजेदपि ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
इच्छन्प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
पृथिव्यु उवाच
इच्छन्भूतिं च कीर्तिं च लोकांश्च मधुसूदन |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
इच्छन्मुहूर्तान्नश्येय़मीशोऽहं जगतो गुरुः ||
४२ ग
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छन्सृजेथास्त्रीँल्लोकानन्यांस्त्वं स्वेन तेजसा ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
इच्छन्हन्यादिमां सेनां किमर्थमपि नेच्छति ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता |
७ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छा सञ्जाय़ते तस्य ततस्तृष्णा प्रवर्तते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
इच्छां द्वेषं च कामं च धैर्येण विनिवर्तय़ेत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
इच्छाद्वेषक्षय़ं प्राप्य कामक्रोधक्षय़ं तथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
इच्छाद्वेषभवैर्दुःखैः प्रकर्षो यत्र जाय़ते |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
इच्छाद्वेषसमाय़ुक्तमात्मानं प्राहुरिङ्गितैः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
इच्छाद्वेषौ भय़ोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव सः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मातर ऊचुः
इच्छाम तासां मातॄणां प्रजा भोक्तुं प्रय़च्छ नः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
गाव ऊचुः
इच्छामस्त्वां वय़ं ज्ञातुं का त्वं क्व च गमिष्यसि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा |
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
धृतराष्ट्र उवाच
इच्छामि चाहमप्येवं न त्वीशो भगवन्नहम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
विराट उवाच
इच्छामि तमहं द्रष्टुमर्चितुं च महावलम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
इच्छामि तस्यान्तिकमाशु गन्तुं; तं चेह नित्यं परिवर्तमानम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
दुःषन्त उवाच
इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते |
६ क
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं का त्वं व्रूहि वरानने ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
इच्छामि दातुं विजय़ं सुखं च; न चात्मानं छादय़ेऽहं त्वदर्थे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छामि नित्यमेवाहं त्वय़ा पुत्र सहासितुम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दित |
१२६ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
इच्छामि भवता प्रोक्तान्गुणान्स्वर्गनिवासिनाम् ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय २३
वृहन्नडो उवाच
इच्छामि वै तव श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २२०
स्वाहो उवाच
इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
युधिष्ठिर उवाच
इच्छामीह त्वय़ाख्यातं विहितं यत्सुरर्षिभिः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेय़ोऽभिकाङ्क्षिणः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजय़स्व नः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
इच्छाम्यहं चरितुं तेन सार्धं; यथा तपः स चरत्युग्रकर्मा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छाम्यहं त्वय़ा दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
इच्छाम्यहं दिव्यमस्त्रमित्यभाषत शङ्करम् ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
इच्छाम्यहं पुण्यकृतां समृद्धाँ; ल्लोकान्द्रष्टुं यदि तेऽहं वरार्हः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
जनमेजय़ उवाच
इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुं; तन्मे विप्रा वितरध्वं समेताः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२८
सोमक उवाच
इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालय़े ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
इन्द्राण्यु उवाच
इच्छाम्यहमिहापूर्वं वाहनं ते सुराधिप |
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ३६
शौनक उवाच
इच्छाम्येतदहं तस्य ऋषेः श्रोतुं महात्मनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
इच्छाव भद्रे ज्ञातुं त्वां तत्त्वमाख्याहि शोभने ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
इच्छे प्रसादात्तव सत्यसन्ध; प्राप्तुं जय़ं पाण्डवेय़ांश्च हन्तुम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
इच्छेज्जातु त्वय़ि पापं विसृज्य; निन्दा चेय़ं तव लोकेऽभविष्यत् ||
२१ ख