उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सञ्जय़ं भूय़ः पर्यपृच्छत भारत |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
इत्युक्त्वा सञ्जय़ं राजा समाधाय़ मनस्तदा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा समरे द्रोणो न्यवर्तत यतः परे |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगेश्वरम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा समय़ं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा समय़ं तत्र चक्राते तावुभौ नृप |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा सहसौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सहितास्ते तु राजानमुपचक्रमुः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा सा प्ररुदती पर्यशङ्कत देवरम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा सा महादेवमगच्छच्छरणं किल ||
६५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा सुभृशं वीरः शीघ्रकृन्निशितैः शरैः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सुहृदः सर्वान्सम्परिष्वज्य चैव ह |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा सैनिकान्सर्वाञ्जय़ापेक्षी नराधिपः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थं प्रागुदीचीमगाद्दिशम् ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
इत्युक्त्वा हि स मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोवनम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि ते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा ह्रिय़माणां तां राजपुत्रीं यशस्विनीम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
इत्युक्त्वाकाशमाविश्य मातलिर्विवुधालय़ान् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वाजगरं देहं त्यक्त्वा स नहुषो नृपः |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
इत्युक्त्वाथाव्रवीत्पुत्रं मणिपूरेश्वरं जय़ः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
इत्युक्त्वादाय़ तान्सक्तून्प्रीतात्मा द्विजसत्तमः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वानुय़यौ पार्थो हय़ं तं कामचारिणम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे धर्मो भगवाँल्लोकभावनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितं तद्वै शक्रं चान्वविशत्प्रभो ||
४७ ग
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देवः परमाद्भुतः |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन्सर्व एव द्विजोत्तमाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्रामो नलमुवाच ह |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितो दिव्यः पुरुषः स महाप्रभः |
४३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताभवम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वार्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
इत्युक्त्वैनमभिक्रुद्धः कक्ष्यामुत्पीड्य पाण्डवः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
इत्युच्चारितवाक्यौ तौ वोधय़ामासतुर्हरिम् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युच्यमानः पार्थेन सैन्धवो न न्यवर्तत |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
इत्युवाच महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा ||
४० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
इत्यूचिवांस्तं स मुमोच वाणं; धनञ्जय़ः कर्णवधाय़ घोरम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
इत्यूचिवान्व्राह्ममसह्यमस्त्रं; प्रादुश्चक्रे मनसा संविधेय़म् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्यूचुर्वहवस्तत्र वितण्डानाः परस्परम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
इत्यूचुस्तं महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
इत्येतच्छक्रवचनं निशम्य प्रतिगृह्य च |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
शुक उवाच
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि भगवान्प्रव्रवीतु मे |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
युधिष्ठिर उवाच
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
इत्येतत्ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुषा |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
इत्येतत्ते मय़ा प्रोक्तं क्षिप्तेनापि सुहृत्तय़ा |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येतत्प्रणय़ात्तात सौभद्रः परवीरहा |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
इत्येतत्प्रतिजानामि विहरिष्याम्यहं यथा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
इत्येतत्सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
इत्येतत्सर्वदेवानां चातुर्वर्ण्यं प्रकीर्तितम् ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
इत्येतत्सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेन मम पार्थिव ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
इत्येतत्सात्त्विकं वृत्तं कथितं वो द्विजर्षभाः |
१४ क