आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽन्योन्यमभिसम्पूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽन्योन्यमामन्त्र्य तथाभिवाद्य; वृद्धान्परिस्वज्य शिशूंश्च सर्वान् |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तेऽन्योन्येन च तुष्यन्ति वहु मन्यन्ति चासकृत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
तेऽन्ववर्तन्पितॄन्सर्वे यशसा च वलेन च ||
११ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तेऽपतन्त हता वाणैर्नानारूपैः किरीटिना |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
तेऽपतन्त हतास्तूर्णं शिनिप्रवरसाय़कैः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तेऽपतन्सहसा राजंस्तस्मिन्राक्षसपुङ्गवे |
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
तेऽपश्यन्पुलिने तं वै विविक्ते निय़तव्रतम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तेऽपश्यन्विहितं व्यूहं धर्मराजेन दुर्जय़म् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽपि कर्मैव कुर्वन्ति विधिं पश्यस्व पार्थिव |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपराय़णाः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
तेऽपि चास्य महाघोरं वलं नागाय़ुतोपमम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि तं परमेष्वासाः शरवर्षैरपूरय़न् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽपि तत्र समाजग्मुर्यामा धामाश्च सर्वशः ||
३२ ग
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तेऽपि तत्स्थानमासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यशः ||
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
तेऽपि त्वां संनमन्तीव पुमांसं कं न मोहय़ेः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि पौत्रेण ते राजन्प्राय़शो विमुखीकृताः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि प्रासैः सुनिशितैः शरैः संनतपर्वभिः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽपि भोगाय़ कल्पन्ते दण्डेनोपनिपीडिताः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
तेऽपि मामेव कौन्तेय़ यजन्त्यविधिपूर्वकम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
तेऽपि यस्मात्स्वभावेन हताः क्षत्रिय़पुङ्गवाः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
तेऽपि लोभसमाय़ुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
तेऽपि शक्त्या महात्मानः प्रतिय़ोत्स्यन्ति पाण्डवाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि सर्वप्रय़त्नेन द्रोणमेव समाद्रवन् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तेऽपि सर्वे महेष्वासा अय़ुद्धार्थिनि कौरवे |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽपि सर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तेऽपीडय़न्भीमसेनं क्रुद्धाः सप्त महारथाः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
तेऽपृच्छन्त पुरा गत्वा पूर्वजातं प्रजापतिम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तेऽप्यधीत्याखिलान्वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
तेऽप्यस्मासु प्रय़ुञ्जीरन्प्रच्छन्नान्सुवहूञ्जनान् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
तेऽप्यस्य भूय़सो दोषान्वर्धय़न्ति विचेतसः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
तेऽप्याय़ुषः प्रमाणेन स्वेन गच्छन्ति जन्तवः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०१
विष्णुरु उवाच
तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिगम्य महात्मानं हृषीकेशमरिन्दमम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिगम्य महात्मानो भरतानां पितामहम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिगम्याव्रुवंस्तत्र कुरवो मधुसूदनम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रिय़ाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तेऽभिवाद्य ततो भीष्मं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपाय़नं तदा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं संशितव्रतम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तेऽभिवाद्य महात्मानं परिवार्य समन्ततः |
१४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभिवाद्यार्ष्टिषेणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तेऽभिय़ाता महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तेऽभ्यधावन्त संरव्धा मद्रराजं तरस्विनः |
२९ क