उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु न प्रवर्तेय़ं निन्दितं कर्म भारत |
२८ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु नगरं सर्वं समुद्रः प्लावय़िष्यति ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
इदं तु नाभिजानामि तव धीरस्य नित्यशः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
इदं तु पुरुषव्याघ्र पुरस्ताच्छ्रुतवानहम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु भारतं वर्षं ततो हैमवतं परम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
इदं तु भारतं वर्षं यत्र वर्तामहे वय़म् |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इदं तु मे त्वमेकाग्रः शृणु मद्रजनाधिप |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु मे महद्दुःखं तुल्यताय़ामपुत्रता |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
इदं तु मे महद्दुःखं यत्प्रवक्ष्यामि भारत |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
इदं तु मे महद्दुःखं वर्तते हृदि नित्यदा |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
इदं तु मे यथाप्रज्ञं शृणु वाक्यं विशां पते |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
इदं तु यदतिक्षुद्रं वार्ष्णेय़ार्थे कृतं त्वय़ा |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
इदं तु राधेय़वचो निशम्य ते; सुताश्च राजंस्तव सैनिकाश्च ह |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
अर्जुन उवाच
इदं तु रूपं मम येन किं नु त; त्प्रकीर्तय़ित्वा भृशशोकवर्धनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
इदं तु लव्ध्वा त्वं स्थानमात्मानं वहु मन्यसे |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु वचनं पार्थ शृण्वेकाग्रमना मम |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु वचनं श्रुत्वा तव दैवनिय़ोगजम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु वचनं सौम्य कार्यं चैव निवोध मे |
८२ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र; प्राप्तुं त्वय़ा यल्लभसे कुवेरात् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मय़ानघ |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
इदं तु सर्वं त्वं राज्ञे दुर्योधन निवेदय़ |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
इदं तु सुमहत्कार्यं शृणु मे यत्समर्थितम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
इदं तृतीय़ं द्रक्ष्यामि तान्येव भवता सह ||
९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तृतीय़ं भ्रातॄणामर्थे यत्स्थातुमिच्छसि |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
इदं ते दुष्करं राजन्निदं ते दुर्विचेष्टितम् |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
इदं ते नातपस्काय़ नाभक्ताय़ कदाचन |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
भीम उवाच
इदं त्वतिकृतं मन्ये द्रौपदी यत्र पण्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
इदं त्वत्यद्भुतं मन्ये यद्युष्मानिह भारत ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
इदं त्वनार्यं कुरुवीरमध्ये; रजस्वलां यत्परिकर्षसे माम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ व्रतं मम |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
इदं त्वामव्रवीद्राजा धार्तराष्ट्रो महामनाः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
३९
शिशुपाल उवाच
इदं त्वाश्चर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वय़ा |
७ क
वन पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
इदं त्विदानीं कुत एव निश्चितं; तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
इदं त्वेवाववोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
इदं दद्याद्द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य वा |
६३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
इदं दुःखतरं मेऽद्य यदिमा मुक्तमूर्धजाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
इदं दुःखमहो कष्टं पापीय़ इति निष्टनन् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
इदं दुर्गं महाघोरं तीर्णमेवोपधारय़ ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थार्थसंश्रितम् |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
युधिष्ठिर उवाच
इदं देय़मिदं देय़ं न क्वचिद्व्यवतिष्ठते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
इदं देय़मिदं देय़मिति नान्तं चिकीर्षति |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
युधिष्ठिर उवाच
इदं देय़मिदं देय़मितीय़ं श्रुतिचोदना |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
इदं द्वारमितो गच्छ राजन्निति पुनः पुनः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजनोचितम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
इदं द्वैपाय़नः पूर्वं पुत्रमध्यापय़च्छुकम् |
६३ क