वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
वनेष्वपि वसन्कच्चिद्धर्ममेवानुवर्तसे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
वनेऽस्मिन्काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वनेऽस्मिन्काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं; मनस्विनं सम्परिवार्य तस्थुः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
वनौकसां गृहपतिनामनुत्तमं; शृणुष्वैतत्क्लिष्टशरीरकारिणाम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वनौकसामिवारण्ये त्वदीय़ानामभूद्भय़म् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
वनौकसामिवारण्ये दह्यतां धूमकेतुना ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
वन्दनार्हाविमौ तस्य वन्दिभिर्वन्दितौ शुभौ |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
वन्दनीय़ाश्च वरदा वय़मप्यनुय़ाय़िनः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वन्दिभिः सततं काले स्तुवद्भिरभिनन्दिताः |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
वन्दिभिश्च नरै राजन्स्त्रीसहाय़ैः सहस्रशः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
वन्दिमागधसूतैश्च स्तुवद्भिर्वोधिताः कथम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
वन्दी तु जाय़ते वैश्यान्मागधो वाक्यजीवनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
द्वारपाल उवाच
वन्देः समादेशकरा वय़ं स्म; निवोध वाक्यं च मय़ेर्यमाणम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
वन्द्यमानो द्विजै राजन्पूज्यमानश्च राजभिः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
वन्धं मोक्षं च या वेत्ति वुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
वन्धकाश्च पशूनां ये ते वै निरय़गामिनः ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वन्धनाद्विप्रमुक्ताश्च राजानो मधुसूदनम् |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
वन्धनानि च राजेन्द्र सञ्छिद्य तुरगा द्विपाः |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
वन्धनाय़तनेष्वेषु विद्ध्यवन्धे पदे स्थितम् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वन्धनो वन्धकर्ता च सुवन्धनविमोचनः |
९८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
वन्धमाज्ञापय़ामास मम चापि सुय़ोधनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१३५
इन्द्र उवाच
वन्धिष्ये सेतुना गङ्गां सुखः पन्था भविष्यति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
वन्धुत्वादथ वा सख्याच्छल्मले नात्र संशय़ः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
युधिष्ठिर उवाच
वन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽपि वा पुनः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
वन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
वन्धुभिः समनुज्ञातो मन्त्रहोमौ प्रय़ोजय़ेत् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
वन्धुभिः सहितः कल्पं ततो मामुपय़ास्यसि |
१९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
वन्धुभिश्च सुहृद्भिश्च भीम त्वमसि तादृशः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
वन्धुमानखिलो धर्मस्तेनासीत्पृथिवीक्षिता ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
वन्धुमापद्गतस्येव तमेवोपागमन्मनः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
वन्धुरं पृथिवीं देवीं विशालपुरमालिनीम् |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
वन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
वन्धुवर्गो न गृह्णाति तेनासि हरिणः कृशः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
वन्धुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेश्यो रजस्वलाः |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
वन्धूनमात्यान्पौत्रांश्च जित्वा सर्वाञ्जिता वय़म् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
वन्धूनां व्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च |
११० क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
वन्धूनां सुहृदां चैव भवेथास्त्वं गतिः सदा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
वन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
वन्धून्सम्वन्धिनश्चान्यान्मध्यस्थान्सुहृदस्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
वन्ध्यया भार्यया कोऽर्थः कोऽर्थो राज्ञाप्यरक्षता ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ||
१०५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
वन्यं नागणय़त्सिंहं तुल्यजातिसमन्वय़ात् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्वहून् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
वन्या ग्राम्याश्चेह तथा कृष्टोप्ताः पर्वताश्रय़ाः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
वन्यैर्वहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
वपन्व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
वपां विलुम्पन्ति हसन्ति गान्ति च; प्रकर्षमाणाः कुणपान्यनेकशः ||
४८ ख