chevron_left  इच्छेत्कोऽर्कांशुसेनाय़ांarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
इच्छेत्कोऽर्कांशुसेनाय़ां चर्तुमैरावतं विना ||
१४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
इच्छेय़ं च गदाहस्तं राजन्द्रष्टुं वृकोदरम् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
इच्छेय़ं तु समागन्तुं समस्तैर्दैवतैरहम् |
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
इच्छेय़ं त्वत्प्रसादाच्च तपस्तप्तुं सुरेश्वर ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
यय़ातिरु उवाच
इच्छेय़ं वै सुरलोकाद्विहीनः; सतां मध्ये पतितुं देवराज ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छेय़मभ्यनुज्ञातुमार्यया श्वशुरेण च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
इच्छय़ैव कृतं पापं सद्य एवोपसर्पति |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
इज्यते पितृय़ज्ञेषु मय़ा नित्यं जगत्पतिः ||
७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
इज्यमानाः स्म लोकेषु सम्प्राप्तास्तुल्यभागताम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
इज्यमानेषु देवेषु चातुर्वर्ण्ये व्यवस्थिते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
इज्यया वा प्रदानैर्वा विप्राणां वर्धते यशः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
इज्याध्ययननित्यश्च धर्मे च निरतः सदा |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
इज्याप्रदानय़ुक्तश्च यथाशक्ति यथाविधि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
इज्याश्चैवार्चनीय़ाश्च यथा चैवं निवोध मे ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
इज्याय़ज्ञश्रुतिकृतैर्यो मार्गैरवुधो जनः |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
इडाज्यहोमाहुतिभिर्मन्त्रशिक्षासमन्वितैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
इडोपहूतं क्रोशन्ति कुञ्जरा अङ्कुशेरिताः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
इडोपहूतय़ोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४
व्यास उवाच
इत एव गृहीतानि मय़ेति प्रहसन्निव ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
इतः कष्टतरं किं नु यद्वय़ं गहने वने |
२० क
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
इतः कष्टतरं चान्यच्छृणु तद्वै तपोधन |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
इतः कृतय़ुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
इतः परं च राजेन्द्र द्रक्ष्यन्ति वनगोचराः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
इतः प्रच्यवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
इतः प्रदानाद्वर्तन्ते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
इतः प्रय़ाता राजेन्द्र पाण्डवा द्यूतनिर्जिताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
इतः सर्वेऽपि गच्छामः शरणं लोकसाक्षिणम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
इतःप्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षय़ः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
इतरान्राक्षसान्घ्नन्तु शासनात्तव पाण्डव ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
इतरास्तु व्यजाय़न्त गन्धर्वांस्तुरगान्द्विजान् |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
इतरास्तु स्त्रिय़ः सर्वाः कुन्त्या सह सुदुःखिताः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
इतरे तु विसंमूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे ||
७१ ग
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
इतरे त्वस्य दशना वभूवुर्दशय़ोजनाः |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
इतरेतरतः पार्थान्भेदय़न्त्वनुरागतः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
इतरेतरतः शूराः सहसैन्याः प्रहारिणः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
इतरेतरमन्वीय़ुर्यथाभागमवस्थिताः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
इतरेतरमामन्त्र्य प्राहुस्तत्र मनीषिणः |
९४ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन्पृथिवीतले ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
इतरेतरसङ्क्रन्दान्न विजानन्ति योषितः ||
४६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
इतरेतरसम्पृक्तैराकीर्णा भाति मेदिनी ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
इतरेतरय़ोनी तौ विद्धि मेघोदधी यथा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
इतरेषां तु मर्त्यानां प्रज्ञय़ा सा प्रणश्यति ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
इतरेषां तु वर्णानां कथं विनिय़मो भवेत् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
इतरेषां तु वर्णानां तारय़ेत्कृशदुर्वलान् ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
इतरेषां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ||
८० ख