शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
इदमुक्तो मय़ा कश्चित्संमतो जनसंसदि |
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
इदमुद्धर्षणं भीमं तेजोवर्धनमुत्तमम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
इदमूचुरमित्रघ्नाः सर्वे भरतसत्तम ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
इदमूचुर्वचः काले धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
इदमूचुर्वचो राजन्कार्त्तिकेय़प्रिय़ेप्सय़ा ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
इदमूचुर्वचो राजन्प्रणिपत्य पितामहम् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
इदमूचुर्वचो हृष्टा धर्मराजप्रिय़ेप्सवः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
इदमूचुश्च चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ||
१९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
इदमेकं गदाय़ुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
इदमेति समुद्धूतं धार्तराष्ट्रस्य यद्वलम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
इदमेव ततः श्रेय़ इति मन्येत तत्त्ववित् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
इदमेवं न चाप्येवमेवमेतन्न चान्यथा |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
इदमेवंविधं कस्माद्देवता नाविशन्त्युत |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
इदानीं कृतकृत्याः स्म याम तत्रैव माचिरम् |
१५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
इदानीं च विजानामि सुकृतं मधुसूदन |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
इदानीं चैव नः कृत्यं पुरस्ताच्च परं स्मृतम् ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
इदानीं तावदेवासौ मय़ा दृष्टः कथं मृतः |
९९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
वासुदेव उवाच
इदानीं तु विशीर्णोऽय़ं दग्धो व्रह्मास्त्रतेजसा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
इदानीं ते हितमुक्तं न चेत्त्वं; कर्तासि राजन्परितप्तासि पश्चात् ||
११ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
इदानीं त्वहमेकाग्रो गतमन्युर्गतज्वरः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
इदानीं पार्थ जानामि न वृद्धाः सेवितास्त्वय़ा |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
धृतराष्ट्र उवाच
इदानीमत्र किं कार्यं प्रकरिष्यामि सञ्जय़ ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
इदानीमागतां तत्र किं नु वक्ष्यति फाल्गुनिः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
इदानीमेव तावत्त्वमपय़ातो रणान्मम |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
इदानीमेव द्रष्टासि प्रधने स्यन्दने स्थितौ |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
इदानीमेष वुद्धोऽस्मि निर्ममो निरहङ्कृतः ||
३६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
इध्मा दर्भाः सुमनसः कलशश्चाभितो जलम् |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
इध्माः परिधय़श्चैव शक्त्योऽथ विमला गदाः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
इध्मानां भारमाजह्रे इध्मवाहस्ततोऽभवत् ||
२४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
इध्मार्थं तु गते तस्मिन्नग्निपुत्रे सुदर्शने |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
इध्मोदकप्रदातारं शून्यपालकमाश्रमे |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्दीवरश्यामतनुः स्थिता तु; यैषापरासन्नमहीतले च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
इन्दुरा इव तत्रान्ये हस्तिहस्ता इवापरे |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
इन्दुर्विसर्गः सुमुखः सुरः सर्वाय़ुधः सहः |
१२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
इन्दुव्रतसहस्रं तु चरेद्यः काय़शोधनम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
इन्द्र प्राकृतय़ा वुद्ध्या प्रलपन्नाववुध्यसे |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
इन्द्रं तर्पय़ सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
इन्द्रं तु दृष्ट्वा राजर्षिः पादय़ोः शिरसा गतः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
इन्द्रं तुष्टाव चेन्द्राणी विश्रुतैः पूर्वकर्मभिः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
इन्द्रः पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च ||
११ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
इन्द्रः प्रमुदितो राजन्धर्मेणापालय़त्प्रजाः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
इन्द्रः श्येनः कपोतोऽग्निर्भूत्वा यज्ञेऽभिजग्मतुः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
ऋषय़ ऊचुः
इन्द्रः सतां संमतश्च निवासश्च महात्मनाम् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
इन्द्रः साक्षात्सहसाभ्येतु विप्र; हविर्यज्ञे प्रतिगृह्णातु चैव |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
इन्द्रः सृगालरूपेण वभाषे क्रुद्धमानसम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान्धैर्येण प्रत्यवस्थितौ ||
२२ ख