chevron_left  इन्द्रकन्याभिरूढंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नरः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ||
९७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रकार्मुकवज्राभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
इन्द्रकाश्यपसंवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्ठद्धनञ्जय़ः |
३० क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
इन्द्रकृष्टैर्वर्तय़न्ति धान्यैर्नदीमुखैश्च ये |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रकेतुरिवोत्थाय़ सर्वाभरणभूषितः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
इन्द्रगोपकचित्रं च यदेतच्चारुविग्रहम् |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्शुकवर्णान्मनोजवान् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
इन्द्रगोपकवर्णाश्च केकय़ा भ्रातरस्तथा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रगोपकवर्णाश्च रक्तवर्माय़ुधध्वजाः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रगोपकवर्णैस्तु भ्रातरः पञ्च केकय़ाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रजिच्चापि सौमित्रिं विभेद वहुभिः शरैः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रजित्कृतकर्मा तु पित्रे कर्म तदात्मनः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
इन्द्रज्येष्ठा इवाभूम मोदमानाः सवान्धवाः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रतीर्थं ततो गत्वा यदूनां प्रवरो वली |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रतीर्थे महाराज त्रिषु लोकेषु विश्रुते ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
इन्द्रतोय़ां समासाद्य गन्धमादनसंनिधौ |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
इन्द्रत्वं त्रिषु लोकेषु प्राप्य वीर्यमदान्वितः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रत्वमर्हो राजाय़ं तपसेत्यनुचिन्त्य वै |
४ क
वन पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
इन्द्रत्वेऽपि स्थितं वीर वलहीनं पराजितम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रद्युम्नो भालुकिश्च कृतचेताः सहस्रपात् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
इन्द्रद्युम्नो भीमजानुर्गय़ः पृष्ठो नय़ोऽनघः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद्यवनश्च कशेरुमान् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
इन्द्रद्विष्टेन यजता मामनादृत्य दुर्मते |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् |
८४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टो यन्त्रनिर्मुक्तवन्धनः ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रध्वजाविवोत्सृष्टौ रणमध्ये परन्तपौ ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
इन्द्रप्रस्थं त्वय़ा कस्मिन्सङ्ग्रामे निर्जितं पुरा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थं त्वय़ैवासौ सपुत्रेण विवासितः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०३ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दनः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे |
५ क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थमथागम्य भीमो भीमपराक्रमः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
इन्द्रप्रस्थस्य चादूरात्समाजग्मुर्महारथाः |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थे ददौ राज्यं वज्राय़ परवीरहा |
७० क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
इन्द्रप्रस्थे निवसतः समय़े यस्य पार्थिवाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रप्रस्थे भवतु ममैव राज्यं; सुय़ोधनो यच्छतु भारताग्र्यः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमाते कृष्णपाण्डवौ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान्नराधिपान् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रप्रीत्या भूमिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः ||
२७ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
इन्द्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप |
१५८ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत् ||
१६ ख