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शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
विगाह्य सागरं वीर दण्डेन मृदितास्त्वय़ा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
विगुणं च पुनः कर्म ज्याय़ इत्यनुशुश्रुम |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
विगुणा ह्यपि संरक्ष्या ज्ञातय़ो भरतर्षभ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
विगुणानि च पश्यन्ति तथानैकान्तिकानि च ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
विगृह्य च सुदुर्वुद्धी पृथिव्यां संनिपेततुः ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
विगृह्य शत्रून्कौन्तेय़ याय़ात्क्षितिपतिस्तदा |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
विगृह्यासनमित्येव यात्रां सम्परिगृह्य च |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
विग्रहं केन वा कुर्यात्सन्धिं वा केन योजय़ेत् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
विग्रहं पाण्डवैः कृत्वा महद्व्यसनमाप्स्यसि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
विग्रहं पूजय़ेद्यो वै लिङ्गं वापि महात्मनः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
दुर्योधन उवाच
विग्रहः समुपारव्धो न हि शाम्यत्यविग्रहात् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
विग्रहः सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महावल ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
विग्रहे तुमुले तस्मिन्नहन्क्षत्रं परस्परम् ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
विग्रहेऽस्मिन्भवान्साह्यं मम दातुमिहार्हति ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
विग्रहो वर्धमानेन नीतिरेषा वृहस्पतेः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
विघट्टनीय़ान्येतानि कुण्डानीति स्म सौवलीम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
विघसं भृत्यशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
युधिष्ठिर उवाच
विघसाशी कथं च स्यात्कथं चैवातिथिप्रिय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
युधिष्ठिर उवाच
विघसाशी कथं च स्यात्सदा चैवातिथिप्रिय़ः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजनः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक्षुचिः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
विघसाशी सदा च स्यात्सदा चैवातिथिप्रिय़ः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
विघसाशी सदा च स्यात्सदा चैवातिथिप्रिय़ः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
विघाटितविचित्राभिः कुथाभी राङ्कवैस्तथा ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
विघातेनैव युज्येय़ुर्न चार्थं किञ्चिदाप्नुय़ुः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
विघूर्णन्स्रस्तसर्वाङ्गः प्रभ्रष्टाभरणाम्वरः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि |
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
विघ्नं निमित्ततो व्रूय़ान्निमित्तं चापि हेतुतः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ||
१९२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
विघ्नकर्ता मय़ा वार्य इति मे व्रतमाहितम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
विचकर्ष ततो दोर्भ्यां धनुर्जलदनिस्वनम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विचकर्ष ततो दोर्भ्यां धनुर्जलदनिस्वनम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
विचकर्ष धनुःश्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्ष्यवत् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
विचकर्ष धनुर्दिव्यं ततः कौरवनन्दनः |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
विचकर्ष रणे पार्थो वाहुभ्यां भरतर्षभ ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
विचक्रोपस्करोपस्थान्भग्नोपकरणानपि ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ; शिवश्च सौम्यश्च हि व्रह्मघोषः ||
१९ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
विचचार महीं कृत्स्नां कृतकामः सुरोपमः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धय़न् ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
विचचार यथाकामं कौन्तेय़ानुगतस्तदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
विचचार यथाकामं त्रिषु लोकेषु नारदः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
विचरन्तं तथा तं तु सङ्ग्रामे जितकाशिनम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
विचरन्तं नरव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
विचरन्तीं स्नुषां तस्य किंनरीमिव भारत ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विचरन्तो रणेऽभ्यघ्नन्प्रासशक्त्यृष्टिभिस्तथा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
विचरन्दृश्यते सैन्ये पाशहस्त इवान्तकः ||
३१ ख