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वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
स माषराशिसदृशैर्वभूव क्षणदाचरैः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
स मासं विभजन्कालं वहुधा पर्वसन्धिषु |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
स मासः पञ्चरात्रेण पूर्णो भवितुमर्हति |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
स मासमुष्य कौन्तेय़ भीममामन्त्र्य नैषधः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
स मासि मास्यध्वरकृद्विधत्ते; तमध्वरे वेदविदः पठन्ति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
स मित्रधनलाभात्तु प्रेत्य चेह च नन्दति ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स मित्रसहमासाद्य त्वभिज्ञानमय़ाचत |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
स मुक्तः पाप्मना तेन व्रह्महत्याकृतेन ह |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीय़ते ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
स मुक्तो न्यपतत्तूर्णं पार्श्वे सव्ये महाहवे |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
स मुक्तो हर्म्यशिखरात्तस्मात्पुनरवापतत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
स मुच्यते शोकदवाग्निसागरा; ल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
स मुदं परमां लेभे पुत्रसंस्पर्शजां नृपः ||
३८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३४
देवा ऊचुः
स मुनिप्रवरो देव जरत्कारुर्महातपाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
स मुनिस्तत्तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
स मुनिस्तस्य नोवाच किञ्चिन्मौनव्रते स्थितः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
स मुहूर्तं ततो युद्ध्वा सौवलोऽथ विशां पते |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
स मुहूर्तं प्रतिभय़ो दारुणः समपद्यत ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
स मुहूर्तं समाश्वस्य सह देव्या महाद्युतिः |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वनवासमरिन्दमः |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वाष्पविह्वलमव्रवीत् ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
स मुहूर्तमिवाश्वस्य सदश्वान्समचोदय़त् |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिवोत्सृज्य वाष्पं शोकसमुद्भवम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
स मुहूर्तादथ नृपो हतौजा अभवत्तदा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
स मूर्च्छां परमां गत्वा ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||
१२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
स मृगान्महिषांश्चैव विनिघ्नन्राजसत्तमः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
स मृगो वाणमादाय़ यय़ावमितविक्रमः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
स मृताश्वश्चरन्पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
स मृतो मृगय़ोनौ तु नित्योद्विग्नोऽभिजाय़ते ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
स मृत्युमुपगूह्यास्ते गर्भमश्वतरी यथा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
स मृद्नन्क्षत्रिय़ानाजौ वातो वृक्षानिवोद्धतः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
स मृद्नन्पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
स मे कदाचिदद्यैव भवेद्भीमसमागमात् ||
२१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
स मे जत्र्वन्तरे राजन्निपत्य रुधिराशनः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रिय़श्च मे |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
स मे तस्मिन्रणे पूर्वं प्राहरत्कङ्कपत्रिभिः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
स मे देवातिदेवस्त्वं शृणु सत्यां गिरं मम ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
स मे नाभिजनज्ञः स्यादाचरेय़ं च यद्विभो |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
स मे निर्वाप्य सहसा चक्षुषी शाम्यते पुनः |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
स मे पितृवधाद्वध्यः पाञ्चाला ये च सङ्गताः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
स मे पृष्टः सञ्जय़ व्रूहि सर्वं; युध्यमानाः कतरेऽस्मिन्न सन्ति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
स मे भवाञ्शंसतु सर्वमेत; ज्ज्ञाने फलं कर्मणि वा यदस्ति |
९ क
वन पर्व
अध्याय १४७
भीम उवाच
स मे भ्राता महावीर्यस्तुल्योऽहं तस्य तेजसा |
१३ क