अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि सकृत्स्पृश्य त्रिरभ्युक्ष्य च मानवः |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि समाधाय़ शशास वसुधामिमाम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि हि सर्वाणि प्रदर्शय़ति सा सदा |
२५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ाणि हय़ानाहुः कर्म वुद्धिश्च रश्मय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणीति तान्याहुस्तेष्वदृश्याधितिष्ठति |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणीति पञ्चैते चित्तपूर्वङ्गमा गुणाः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थांश्च महाभूतानि पञ्च च |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थांश्च वहु चिन्त्यमचिन्तय़न् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थांश्च शरीरस्थोऽतिवर्तते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थांश्च सर्वानात्मनि संश्रितान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थानां ज्ञानानि कवय़ो विदुः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थाश्च तत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेभ्यः प्रिय़ेभ्यः संनिवर्त्य सः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेभ्यो निवर्त्य मनसा मुनिः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ाणीन्द्रिय़ार्थेषु वर्तन्त इति धारय़न् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणीह रक्षन्ति धनधान्याभिगुप्तय़े |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाण्यपि वुध्यन्ते स्वदेहं देहिनो नृप |
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाण्यवसृज्यापि दृष्ट्वा पूर्वं श्रुतागमम् |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
इन्द्रिय़ाण्युपसंहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाण्येव तत्सर्वं यत्स्वर्गनरकावुभौ |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाण्येव मेध्यानि विजेतव्यानि कृत्स्नशः ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाभिजय़ो धैर्यं संविभागो दमः शमः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
इन्द्रिय़ार्था यथा देहं शश्वद्देहभृतां वर ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
इन्द्रिय़ार्थाननुभवन्वुद्धिमाँल्लोकपूजितः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
इन्द्रिय़ार्थाश्च भवतां समानाः सर्वजन्तुषु ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
इन्द्रिय़ार्थेषु सक्तः सन्स्वकार्यात्परिहीय़ते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रिय़ार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिः प्रपितामह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ावजय़ो दाक्ष्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
इन्द्रिय़ेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
इन्द्रिय़ेभ्यश्च पञ्चभ्यो मनसश्चैव भारत |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
इन्द्रिय़ेभ्यो मनः पूर्वं वुद्धिः परतरा ततः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ैः प्रसृतो लोभाद्धर्मं विप्रजहाति यः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ैः प्रसृतो वालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
इन्द्रिय़ैः सृज्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्मृतम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ार्थांस्त्वमनुभूय़ यथाविधि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
इन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ार्थेभ्यश्चरत्यात्मवशैरिह |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
इन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
इन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
इन्द्रिय़ैरुपलभ्यन्ते पञ्चधा पञ्च पञ्चभिः ||
१४ ख