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शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
इमां वै वसुसम्पन्नां वसुधां वसुधाधिपः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
इमां श्रिय़ं प्रज्वलितां भारतीं सर्वराजसु |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
इमां सपर्यां सह सर्वकामदैः; श्रिय़ाश्च शक्रप्रमुखैश्च दैवतैः |
९३ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
इमां सागरपर्यन्तां परीय़ुररिमर्दनाः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
इमां सिद्धामितो नेतुं तत्र यत्र प्रजापतिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
इमां हि धरणीं पूर्वं नष्टां सागरमेखलाम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
इमाः काशिपतेः कन्या मय़ा निर्जित्य पार्थिवान् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
इमाः प्रजा महावाहो धार्मिका इति नः श्रुतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
इमाः प्रजाः क्षत्रिय़ाणां रक्ष्याश्चाद्याश्च भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
इमाः स्म देव सम्प्राप्तास्त्वत्सकाशमरिन्दम |
४८ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
इमाञ्शकुनिकान्राजन्हन्ति वैतंसिको यथा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
इमानन्यान्समसृजत्पावकान्प्रथितान्भुवि |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
इमानि चित्राणि च गन्धवन्ति; माल्यानि तस्योद्ग्रथितानि पट्टैः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १२८
धर्म उवाच
इमानि तव दृश्यन्ते फलानि ददतां वर ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
इमानि नारीवाक्यानि कथय़ानः पुनः पुनः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
इमानि पाण्डवानां च सृञ्जय़ानां च भारत |
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
इमानि लोकद्वाराणि यो वै सञ्चरते सदा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
इमानि हि प्रापय़न्ति सृजन्त्युत्तारय़न्ति च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
इमानीष्टविभागानि फलानि तपसा सदा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
इमान्किं पार्थिवान्सर्वान्घातय़िष्यस्यनागसः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
इमान्देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
इमान्निपतितान्दृष्ट्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄंस्तथा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य कानिचित् |
१३३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
इमान्यमृतकल्पानि मूलानि च फलानि च |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
इमान्विदध्याद्व्यनुसृत्य यो वै; राजा महीं पालय़ितुं स शक्तः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
इमान्हि पुरुषव्याघ्रानचिन्त्यवलपौरुषान् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १७७
सर्प उवाच
इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इमामत्रोपमां चापि निवोध वदतां वर |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
इमामपि च ते वालामनाथां परिभूय़ माम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
इमामवस्थां गमितः प्रत्यमित्रै रणाजिरे |
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थां प्राप्तस्य लूनपक्षस्य सञ्जय़ ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
इमामवस्थां प्राप्तोऽस्मि कालो हि दुरतिक्रमः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्तं दीनमार्तं श्रिय़श्च्युतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्तः पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्तमनिमित्तमिहाद्य माम् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्ता का मदन्या जिजीविषेत् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थां सम्प्राप्तो ह्यहं कोपान्मनीषिणाम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थामापन्नः पश्य दैवमिदं मम ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
इमामवस्थामापन्ना राज्यलेशवुभुक्षय़ा ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
इमामश्वशताभ्यां वै द्वाभ्यां तस्मै निवेदय़ |
९ क
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
इमामसितकेशान्तां शतपत्राय़तेक्षणाम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
इमामुद्धृतवान्भूमिमेकशृङ्गस्ततो ह्यहम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
इमामुर्वीं न जय़ेद्विक्रमेण; देवश्रेष्ठोऽसौ पुरा चेदमेय़ः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
इमामेकोपमां राजञ्शृणु सत्यामशङ्कितः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
इमाविति ततश्चक्रे मतिं प्राणविनाशने ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वशः परिचारिकाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
इमे गन्धर्वजाः कामं पूरय़िष्यन्ति ते हय़ाः ||
५१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
इमे च कस्य नाराचाः सहस्रा लोमवाहिनः |
२५ क