शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
संविभज्य गुरोश्चर्यां तद्वै दुष्करमुच्यते ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
संविभज्य च भूतेषु विसृज्य च सुरेश्वरः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
संविभज्य यदा भुङ्क्ते न चान्यानवमन्यते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
संविभज्य हि भोक्तव्यं धनं सद्भिरितीष्यते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
संविभज्यास्तु कौन्तेय़ा धर्म एष सनातनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
संविभागं दमं शौचं सौहृदं च व्यपाश्रिताः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव शिष्यते |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
संविभागोऽत्र भूतानां सर्वेषामेव शिष्यते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
संविवेश नरेन्द्रस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
संविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार ह ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
संवृतं चेति मन्वानो द्वारदेशादुपारमत् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
संवृतं समरे भीष्मं देवैरपि दुरासदम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
संवृतः पार्षदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
संवृतः समरश्लाघी गुप्तः कृपवृषादिभिः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
संवृतः सिन्धुसौवीरैर्नखरप्रासय़ोधिभिः |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
संवृता गतसत्त्वैश्च मनुष्यगजवाजिभिः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
संवृता द्रोणपुत्रेण पावकान्तर्गताभवन् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
संवृते केतनैर्हेमैर्मणिविद्रुमचित्रितैः |
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
संवृते नरसिंहैस्तैः कुरूणामृषभेऽर्जुने |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
संवृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधाय़ुधपाणिभिः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
संवृतो राजमार्गश्च धूपनैश्च सुधूपितः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
संवृतोऽप्सरसां सङ्घैर्मोदते गुह्यकाधिपः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
संवृतोऽय़ं तथा देही सत्त्वराजसतामसैः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
संवृत्तः ||
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
संवृत्तस्ते परः कामः पाण्डवान्दग्धवानसि ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
संवृत्ताः पुनरावृत्ता वहुधा रथनेमिभिः ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसङ्क्षय़ात् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
संवृत्तौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ वलान्वितौ ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
संवृत्य विद्ययात्मानं योधय़ामास पाण्डवम् |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
संवृद्धो युवनाश्वस्य जठरे यो महात्मनः |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
संवेशय़न्ती शय़ने शनकैर्वाक्यमव्रवीत् ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
संवेष्टमानानुद्विग्नान्निरुत्साहान्सहस्रशः |
१२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
संवेष्ट्यमानं वहुभिर्मोहतन्तुभिरात्मजैः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
संवेष्टय़न्ननीकानि शरवर्षेण पाण्डवः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
संवेष्टय़ित्वा नश्यन्ति वाय़ुवेगपराहताः ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकगणांश्चैव वेगतोऽभिविदुद्रुवे ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकगणानां च गोपालानां च भारत |
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकगणान्क्रुद्धो अभ्यधावद्धनञ्जय़ः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकगणान्भूय़ः पुत्रस्ते समचोदय़त् ||
९२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
संशप्तकनिहन्तारं हन्तारं सैन्धवस्य च ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकसमुद्रं तमुच्छोष्यास्त्रगभस्तिभिः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
संशप्तका युद्धशौण्डा वामं पार्श्वमपालय़न् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
धृतराष्ट्र उवाच
संशप्तका वा पार्थस्य किमकुर्वत सञ्जय़ ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
संशप्तका हताः सर्वे काम्वोजाश्च शकैः सह |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकांश्च कौन्तेय़ः कुरूंश्चापि वृकोदरः |
१३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकाः समारोहन्सहस्राणि चतुर्दश ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
संशप्तकानभिमुखौ प्रय़ातौ केशवार्जुनौ |
७१ क