अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
इष्टस्त्रिदशशार्दूल तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ||
३७ ग
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
इष्टा धनपतेर्नित्यं वर्गा नाम महावल ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
इष्टा मृगाः पृष्ठतो वामतश्च; सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
इष्टा वाचः पृष्ठतो वाय़सानां; सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टाँल्लोकानवाप्स्यामो व्रह्मण्याः सत्यवादिनः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
इष्टादातार एवैते नैते भूतस्य भावकाः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
इष्टानां च महात्मानो भक्तानां च न संशय़ः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च चिकीर्षति ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च निषेवते ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रिय़ाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
इष्टानिष्टविकल्पश्च व्यवसाय़ः समाधिता |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
इष्टानिष्टविमुक्तस्य प्रीतिरागवहिष्कृतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
इष्टानिष्टविय़ुक्तं हि तस्थौ व्रह्म परात्परम् |
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
इष्टानिष्टविय़ोगानां कृतानामविकत्थनम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
इष्टानिष्टसमाय़ोगो वैरं सौहार्दमेव च |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
इष्टानिष्टान्मनुष्याणामस्तं गच्छन्ति रात्रय़ः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
इष्टानिष्टो भवेद्गन्धस्तन्मे विस्तरतः शृणु ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
इष्टान्दारांश्च पुत्रांश्च न चान्यं यद्वचो भवेत् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
इष्टान्पुण्यकृतां लोकान्प्राप्नुय़ाम न संशय़ः ||
३६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
इष्टान्प्राणानहं हीमांस्त्यक्ष्यामि रिपुसूदन ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
इष्टान्भोगान्नानुरुध्येत्सुखं वा; न चिन्तय़ेद्दुःखमभ्यागतं वा ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टान्सर्वानभिप्राय़ान्प्राप्स्यामः सर्वराजसु ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
इष्टापूर्तं च ते घ्नन्ति सप्त चैव परावरान् ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
इष्टापूर्तं हि ते क्लीव कीर्तिश्च सकला हता |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
इष्टापूर्तफलं न स्यान्न शिष्यो न गुरुर्भवेत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
इष्टापूर्तात्तथा क्षात्राद्व्राह्मण्याच्च स नश्यतु |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
इष्टापूर्तादसाधूनां विषमा जाय़ते प्रजा |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टापूर्तेन च तथा वक्तव्यमनृतं न तु ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
इष्टापूर्तेन च शपे वीर्येण च सुतैरपि ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
इष्टापूर्तेन दानेन सत्येन च जपेन च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिं कृत्वा यथान्याय़ं सुसमिद्धे हुताशने |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षिः पुत्रकारणात् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
इष्टिं चाहं करिष्यामि विनाशाय़ास्य दुर्मतेः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदव्दपर्यये |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
इष्टिः पुष्टिर्यजनं याजनं च; दानं पुण्यानां कर्मणां च प्रय़ोगः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कर्तव्याभिमतेऽग्नय़े ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नय़े ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचय़ेऽग्नय़े ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या दस्युमतेऽग्नय़े ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नय़े ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतय़ेऽग्नय़े ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचय़ेऽग्नय़े ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्यादुत्तराग्नय़े ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
इष्टिसत्रेण संसिद्धो भूय़श्च तपसा मुनिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
इष्टीश्च पशुवन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टीश्च पित्र्याणि तथाग्रिय़ाणि; महावने वसतां पाण्डवानाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
इष्टीश्च विविधाः प्राप्य क्रतूंश्चैवाप्तदक्षिणान् |
४ क