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वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टेन च शपे राजन्सूदय़िष्यामि राक्षसम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
इष्टेषु विसृजत्यर्थान्कुवेर इव कामदः |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्टैः स्वाध्याय़घोषैश्च देवतूर्यरवैरपि |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
इष्टो भक्तश्च मे कर्णो न चान्यद्दैवतं दिवि |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
इष्टो वातः प्रविष्टस्य दक्षिणा प्रविविक्षतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
इष्टो वामः प्रविष्टस्य दक्षिणः प्रविविक्षतः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः |
४७ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
इष्टो हि पुत्रस्य पिता सदैव; तदस्मि कर्ता विदुरात्थ मां यथा ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
इष्टो हि वासुदेवस्य पाण्डवैर्मम विग्रहः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
इष्टोऽनिष्टश्च शव्दस्तु संहतः प्रविभागवान् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
इष्ट्या चैनं तर्पय़ित्वा मानय़ां चक्रिरे तदा ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वा क्रतुसहस्रेण वाजिमेधशतेन च |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
इष्ट्वा ते पुण्डरीकेण दत्ता राज्ञा द्विजातिषु |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
इष्ट्वा पुण्यैर्महाय़ज्ञैरिष्टाँल्लोकानवाप्स्यसि ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
इष्ट्वा महार्हैः क्रतुभिर्नृसिंह; संन्यस्य देहान्सुगतिं प्रपन्नाः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वा यथावद्वलभिदरुणाय़ामुपास्पृशत् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वानन्त्याय़ गोविन्दं पश्यत्यात्मन्यवस्थितम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
इष्ट्वानेकैर्महाय़ज्ञैर्व्राह्मणेभ्यो न तेन च ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
इष्ट्वाश्वमेधैर्वहुभिर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
इष्ट्वेष्टतपसः पूता व्रह्मलोकमुपाश्रिताः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र व्रह्महत्यापहा हि सा ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
इष्टय़ः पशुवन्धाश्च काम्यनैमित्तिकाश्च ये |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
इष्यते यद्विधो राजन्भविता ते तथाविधः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
इष्यते यशसः प्राप्तिः कीर्तिश्च त्रिदिवे स्थिरा ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
इष्वस्त्रं मम वालस्य भवतैव चतुर्विधम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येय़ं नृपतेर्मही ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रकुशलाश्चैव तथा सर्वास्त्रय़ोधिनः ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रज्ञान्पर्यपृच्छदाचार्यान्वीर्यसंमतान् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
इष्वस्त्रवरसम्वाधं क्षोभय़िष्ये वलार्णवम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
इष्वस्त्रविधिसम्पन्ने मालवे च सुदर्शने ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
इष्वस्त्रविन्महातेजा लक्ष्मणोऽऽर्जुनिमभ्ययात् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
इष्वस्त्रसागरं घोरं वाणग्राहं दुरासदम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
इष्वस्त्राणि च सङ्ग्रामेष्वसुखानि च वेश्मनि ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रे चारुसन्धाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
इष्वस्त्रे चैव राजेन्द्र द्रोणशिष्यो वभूव ह ||
१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
इष्वस्त्रे द्रोणशिष्याश्च कृपस्य च शरद्वतः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रे निपुणो योधः सदा वीरश्च मे सुतः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
इष्वस्त्रे भारसन्धाने लाघवेऽस्त्रवले तथा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं निय़ममास्थितः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
इष्वस्त्रे सदृशो राज्ञः कार्तवीर्यस्य पाण्डवः ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
इष्वस्त्रोत्तमभर्तारं दिगन्तं चैव दक्षिणम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
इसृपा एकचक्रश्च विरूपाक्षो हराहरौ |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
इसृपा नाम यस्तेषामसुराणां वलाधिकः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशय़ः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ||
३ ख