आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमितो गताः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इह कीर्तिं परे लोके दीर्घकालं महत्सुखम् |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
इह कीर्तिं समाधाय़ प्रेत्य लोकान्समश्नुते |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
इह कीर्तिर्विधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
इह कृत्वा तपो घोरं देहं संन्यस्य मानवाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
इह क्लेशाय़ तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
इह क्षेत्रे क्रिय़ते पार्थ कार्यं; न वै किञ्चिद्विद्यते प्रेत्य कार्यम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
इह खल्वमुष्मिंश्च लोके सर्वारम्भप्रवृत्तय़ः सुखार्था अभिधीय़न्ते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
इह च प्रेत्य च श्रेय़स्तस्य मूलं धृतिः परा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद्वृत्तिं न रोचय़े ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इह चामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
इह चामुत्र चैवेति कृपणाः फलहेतुकाः ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
इह चिन्ता वहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
इह चेल्लभ्यते लक्ष्यं कृत्स्नाञ्जेष्यामहे परान् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
इह चैवागतस्तेन विसृष्टः परमात्मना ||
५१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
इह चैवागतोऽस्म्यद्य विसृष्टः परमात्मना ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
इह जाता विवृद्धास्मि पिता चेह ममेति च |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
इह तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
पाण्डुरु उवाच
इह तस्मात्प्रजाहेतोः प्रजाय़न्ते नरोत्तमाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
इह ते न्यवसन्राजन्क्षान्ताः परमधर्मिणः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
इह ते पार्थ दृश्यन्तां सङ्ग्रामे पुरुषो भव ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
इह ते वै चरून्प्राश्नन्नृषय़श्च विशां पते |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
इह तेन तपस्तप्तं षष्टिं वर्षशतान्यथ ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
इह त्यक्त्वा न तिष्ठन्ति वान्धवा वान्धवं प्रिय़म् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
भीष्म उवाच
इह त्वमभिसम्प्राप्तः कस्यार्थे किं प्रय़ोजनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
इह त्ववश्यं गदतो ममापि; वाक्यं निवोधध्वमनन्यभावाः ||
४१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
इह देवः सपत्नीकः समाक्रीडत्यधोक्षज ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
इह देवाः सदा सर्वे यज्ञानाजह्रुरुत्तमान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
इह देवैः सहेन्द्रैर्हि प्रजापतिभिरेव च |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
इह धर्मपराः केचित्केचिन्नैकृतिका नराः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
इह नानाविधाकारा नानाविधविभूषणाः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
इह नित्यशय़ा देवाः पितरश्च महर्षिभिः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
इह नो ग्लहमानानामद्य तात जय़ाजय़ौ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
इह पुंसां सहस्राणि स्त्रीसहस्राणि चैव हि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
इह पुण्यफलं लव्ध्वा नाधिवन्धेन योक्ष्यसे ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
इह प्राज्ञो हि पुरुषः स्वल्पमप्रिय़मिच्छति |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनञ्जय़ |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
इह प्राय़मुपासिष्ये यूय़ं व्रजत वै गृहान् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
इह भूत्वा शिशुः साक्षात्किं भवानवतिष्ठते |
१२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
इह मर्त्यास्तपस्तप्त्वा स्वर्गं गच्छन्ति भारत |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
इह मां सम्प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
इह यः सहधर्मो वै प्रेत्याय़ं विहितः क्व नु ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
इह यत्क्रिय़ते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
इह यत्क्रिय़ते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
इह यत्तैर्निराकारैर्वस्तव्यमिति रोचय़े |
१९ क