शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
इहैव ते निवर्तन्तां ये नः केचन भीरवः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
इहैव ते पाण्डवा वीर्यवन्तः; शक्रस्यांशः पाण्डवः सव्यसाची ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
इहैव ते शास्त्रकारा भवन्ति; प्रहाय़ देहं परमं यान्ति योगम् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः |
१९ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव त्वं मां प्रतीक्षस्व राम; यावत्स्त्रिय़ो ज्ञातिवशाः करोमि ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
इहैव त्वहमासिष्ये प्रेषय़िष्यामि चापरान् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
इहैव दृश्यते राज्ञो भ्राता यस्य धनञ्जय़ः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
इहैव देवताश्रेष्ठं देवाः सर्षिगणाः पुरा |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
इहैव परिवर्तन्ते तिर्यग्योनिप्रवेशिनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव पाण्डवाः सर्वे तथैवान्धकवृष्णय़ः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
इहैव पुत्रौ निक्षिप्य नलस्याशुभकर्मणः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव प्राय़माशिष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशय़ः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव प्राय़मासिष्ये तन्निवोधत पाण्डवाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षति शक्तितः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव |
३ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
इहैव विलय़ं यान्ति कुतस्तेषां समागमः ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव शोषय़िष्यामि तपसाहं कलेवरम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
इहैव सम्प्रवेष्टाहं ज्वलितं जातवेदसम् ||
३७ ग
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
इहैव सर्वे शृण्वन्तु तस्या अस्य च यद्वचः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
इहैव सा भ्राम्यति क्षीणपुण्या; शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां; क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनञ्जय़ेन |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
इहैवाशुभकर्मा तु कर्मभिर्निरय़ं गतः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
केशिन्यु उवाच
इहैवास्स्व प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
भीम उवाच
इहैवैतांस्तुरा सर्वान्हन्मि शत्रून्समागतान् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
इहैवैतामानय़ प्रातिकामि; न्प्रत्यक्षमस्याः कुरवो व्रुवन्तु ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
इहैवोच्चावचान्भोगान्प्राप्नुवन्ति स्वकर्मभिः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
इहैषां दोषवद्वासं वर्णय़न्तु पृथक्पृथक् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
इहोपय़ातेति स पापवुद्धिः; कच्चिच्छेते शरसम्भिन्नगात्रः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
इय़ं कन्या नरश्रेष्ठ हर्यश्व प्रतिगृह्यताम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
इय़ं कन्या सुतौ द्वौ ते जनय़िष्यति पार्थिवौ ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
अर्जुन उवाच
इय़ं कूटे मनुष्येन्द्र गहना महती शमी |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
इय़ं गङ्गेति निय़तं प्रतिष्ठा; गुहस्य रुक्मस्य च गर्भय़ोषा |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
इय़ं गुणानां षट्त्रिंशत्षट्त्रिंशद्गुणसंय़ुता |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
अकृतव्रण उवाच
इय़ं च कन्या राजर्षे किमर्थं वनमागता |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च कीर्तिता कृष्णा सौवलेन पणार्थिना |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
इय़ं च कृपणा वृद्धा हतपुत्रा तपस्विनी |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च द्रौपदी कृष्णा हतज्ञातिसुता भृशम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
इय़ं च नलिनी रम्या जाता पर्वतनिर्झरे |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
इय़ं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च भूरिश्रवसो भार्या परमदुःखिता |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
इय़ं च महती सेना सागरश्चापि दुस्तरः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च माता ज्येष्ठा मे वीतवाताध्वकर्शिता |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय़ वै ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
इय़ं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं च राज्ञो मगधाधिपस्य; सुता जरासन्ध इति श्रुतस्य |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
इय़ं च वृहती श्यामा श्रीमत्याय़तलोचना |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
शुक्र उवाच
इय़ं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
इय़ं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने |
१२ क