वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
इति गीताः काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मय़ानघ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्तितः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
इति गुह्यानि नामानि चक्रे तेषां युधिष्ठिरः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
इति गृह्णामि तत्पार्थ तव दृष्ट्वापराक्रमम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
इति चाप्यहमश्रौषं वचस्तेषां दय़ावताम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
इति चाप्यागमं भूय़ो दैवस्य प्रतिपालय़े ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
इति चिन्ताविषक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
इति चिन्त्यानय़ामास देवसेनां स्वलङ्कृताम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इति चैकोनविंशोऽय़ं द्वन्द्वय़ोग इति स्मृतः ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
इति चैवानुशिष्टोऽस्मि पूर्वैस्तात पितामहैः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
इति जानीत सत्यं मे क्रिय़तां यदनन्तरम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
इति तं वन्दिनः प्राहुर्द्विजाश्च भरतर्षभ ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इति तण्डिस्तपोय़ोगात्तुष्टावेशानमव्ययम् |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
इति तत्कुरु कौन्तेय़ सत्यं वाक्यमरिन्दम ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
इति तत्कुरु कौन्तेय़ सत्यं वाक्यमरिन्दम |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
इति तत्कृतवांश्चाहं यथोक्तं भरतर्षभ ||
२५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
इति तत्र महाराज प्राक्रोशद्द्रौणिमेव च |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
इति तथ्यं महाराज सर्वमेतद्व्रवीमि ते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
इति तद्धनुरादाय़ शुल्कावाप्तं महारथः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
इति तद्राजवचनं प्रतिश्रुत्याथ मन्थरा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
इति तद्वः प्रय़ततां कृतं पार्थेन संय़ुगे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
इति तन्मय़मेवेदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
इति तन्मय़मेवैतत्सर्वं स्थावरजङ्गमम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
इति तस्य निशम्याहं सारथेः करुणं वचः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा केशवः परवीरहा |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा ततश्चेदिपतिर्नृपः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा वय़मुत्थाय़ सत्वराः |
५६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
इति तस्य व्यवसितं ज्ञात्वा त्यागात्मकं मनः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
इति तस्य व्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
इति तस्याः प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय़ |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
इति ताः पुरुषव्याघ्र कथं शक्याः स्म रक्षितुम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
इति तात विजानीहि द्वय़मेतदसंशय़म् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
इति तान्प्रति भाषन्वै वैश्यापुत्रो महामतिः |
५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इति तीर्थानुसर्तारं राक्षसी काचिदव्रवीत् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
इति ते कत्थमानस्य श्रुतं संसदि संसदि |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
इति ते कथितं राजन्यथावृत्तं श्रुतं मय़ा ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
इति ते कथय़न्ति स्म व्राह्मणा जम्भसाधकाः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मय़ा |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
इति ते तस्य तच्छ्रुत्वा देवर्षेर्मधुरं वचः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनय़ं शृणु ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
इति ते भीष्म शृण्वानाः परं विस्मय़मागताः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
इति ते मेनिरे सर्वे पवनेन विमोहिताः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
इति ते वै द्विजाः श्रुत्वा तस्य घोरस्य रक्षसः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
इति ते शिरसा नत्वा त्रिलोकेशं पितामहम् |
१०६ क