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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थं गतं तु वै ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
इति पृष्टा सुमनय़ा मधुरं चारुहासिनी |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
इति पृष्टो द्विजैस्तैः स प्रहस्य नकुलोऽव्रवीत् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
इति पृष्टो महाराज पराशरशरीरजः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
इति पृष्टो महाराज्ञा कौसल्येनामितौजसा |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म समन्ततः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
ऋत्विज ऊचुः
इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
इति प्रस्थानकाले मां कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
इति प्राज्ञः प्रज्ञय़ैतद्विचार्य; घटोत्कचं सूतपुत्रेण युद्धे |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
इति प्राय़ादुपसङ्गृह्य पादौ; समुत्थितो दीप्ततेजाः किरीटी |
१०० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
इति प्रोक्तं कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वय़ं तदा ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
इति भूमेर्वचः श्रुत्वा वासुदेवः प्रतापवान् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
इति भ्रातृवचः श्रुत्वा न हन्मि त्वां जनाधिप |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
इति मत्वा भजन्ते मां वुधा भावसमन्विताः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
इति मत्वा स चात्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
पराशर उवाच
इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तमः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
इति मत्वाव्रवीद्धर्मं परमेष्ठी प्रजापतिः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
इति मन्यामहे सर्वे भवन्तं प्रणताः स्थिताः ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
इति मर्त्यो विजानीय़ात्सततं भरतर्षभ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
इति मां त्वं विजानीहि सर्वलोकस्य जाजले |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स वध्यते ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
इति मां सङ्गताः सर्वे तर्कय़िष्यन्ति शत्रवः ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
इति मातङ्गवचनं परीप्सन्ति हितेप्सवः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
इति मामभ्यपद्यन्त वुद्धिमात्सर्यमोहिताः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
इति मामव्रवीत्कर्णः पश्यतस्ते धनञ्जय़ |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
इति मामव्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
इति मामव्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनस्तदा ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
इति मामव्रवीद्राजा पार्थश्चैव धनञ्जय़ः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
इति मामव्रवीद्वाल्ये यः स वध्यः कथं मय़ा ||
८८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
इति मासा नरव्याघ्र क्षपतां परिकीर्तिताः |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
इति मे चिन्तय़ानस्य पितः शर्म न विद्यते ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
इति मे त्वं मतं वेत्थ तत्र किं सुकृतं भवेत् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
इति मे निश्चिता वुद्दिर्वासुदेवमवेक्ष्य ह ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
इति मे निश्चिता वुद्धिरेषा साधुमता च मे ||
३१ ग
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
इति मे नैष्ठिकी वुद्धिर्वर्तते कुरुनन्दन ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
इति मे वर्तते वुद्धिः समा सर्वत्र जाजले ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
इति मे वर्तते वुद्धिर्मा राजन्विमना भव ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
इति मे वर्तते वुद्धिर्मा वो नन्दन्तु शत्रवः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
जनमेजय़ उवाच
इति मे वर्तते वुद्धिस्तथा चैतदसंशय़म् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
इति मे वर्तते वुद्धिस्तद्भवान्कर्तुमर्हति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्ये न रक्षति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
इति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
इति यः सततं मन्दमवोचल्लोभमोहितम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
इति यस्य महाघोरं व्रतमासीन्महात्मनः ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
इति यस्य सदा भावो न स मुह्येत्कदाचन ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
इति यास्ताः कथं वीर संरक्ष्याः पुरुषैरिह ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
इति यूपध्वजस्यैताः स्त्रिय़ः क्रोशन्ति माधव ||
१५ ख