अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
इति ये संवदन्त्यत्र त एतं निश्चय़ं विदुः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इति रक्षोपसृष्टेषु विषवीर्यहतेषु च |
७२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
इति रणरभसस्य कत्थत; स्तदुपनिशम्य वचः स मद्रराट् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
इति राजन्मय़ः प्राह वर्तते च तथैव तत् ||
३१ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
इति राजान्वशाद्भ्रातॄन्नित्यमेव युधिष्ठिरः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
इति राजाव्रवीद्देवं नेति देवस्तमव्रवीत् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
इति राज्ञां चतुर्विंशन्नारदेन सुरर्षिणा |
१७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
इति राज्ञां पुरावृत्तमभिजल्पन्ति साधवः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
इति राज्ञाम्वरीषेण गाथा गीता यशस्विना |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
इति राष्ट्रे परिपतन्वहुशः पुरुषैः सह |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
इति लालप्यमानाः स्म शेरते वहवो जनाः ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वेमां भवतो व्यथाम् ||
७१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
इति वक्ष्यामि राजानं यदि मामनुय़ोक्ष्यते ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
इति वहुपरुषं प्रभाषति; प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम् |
७० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
इति वागन्तरिक्षे मां सूतकेऽभ्यवदत्पुरा ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
इति वाचमभिश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
इति वाचा मधुरय़ा श्लक्ष्णय़ा सोपचारय़ा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
इति वाचा वदन्हन्तॄन्पूजय़ेत रहोगतः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
इति वाचो व्रुवन्त्यस्ताः स्त्रिय़ः प्रेम्णा नराधिपम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
इति वार्हस्पतं ज्ञानं प्रोवाच मघवा स्वय़म् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
इति वाल्ये श्रुतः पूर्वं मय़ा व्यासमुखात्पुरा |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
इति वाष्पकलां वाचं कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
इति विद्धि महाप्राज्ञे क्रोधमूलौ भवाभवौ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
इति विद्यातपोय़ोनिरय़ोनिर्विष्णुरीडितः |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
इति विप्रलपन्मन्ये नृशंसैर्वहुभिर्हतः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
इति वुद्धिगतिः सर्वा व्याख्याता तव भारत ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इति वुद्धिमतां नीतिस्तन्ममापीह रोचते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
इति वुद्ध्या विनिश्चित्य गमनाय़ोपचक्रमे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
इति वुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चय़मीश्वराः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
इति वृद्धो विलप्यैतत्कृपः शारद्वतो वचः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
इति वृश्चिकदष्टस्य नानाविषहतस्य च |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
इति वेदा वदन्तीह सिद्धाश्च परमर्षय़ः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
इति वै पण्डितो भूत्वा भूतानां नोपतप्यति ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्यवसितं पार्थ धार्तराष्ट्रस्य मे श्रुतम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्यवसिताः सर्वे धार्तराष्ट्रा जनार्दन ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्यवसितास्तेषु वचनं स्यान्निरर्थकम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
इति व्यवस्था भूतानां पुरस्तान्मनुना कृता ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्यासस्य वचनं श्रुत्वा सर्वो जनस्तदा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
इति व्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमर्हसि ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
भीष्म उवाच
इति व्रह्मा स भगवानुवाच परमेश्वरः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
इति व्रुवञ्शल्यममित्रहन्ता; कर्णो रणे मेघ इवोन्ननाद ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवञ्शान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवम् |
६२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवति राजेन्द्रे धृतराष्ट्रे युधिष्ठिरम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवति राधेय़ं मद्राणामीश्वरे नृप |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्तः परमाशिषस्ते; पार्थास्तपोय़ोगपरा वभूवुः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्तः प्रय़युर्ये तत्रासन्समागताः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवन्तः शिविराणि जग्मुः; सर्वे गणा भारत ये त्वदीय़ाः |
१३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
इति व्रुवन्तीं तां साध्वीं धर्मात्मा स द्विजर्षभः |
१९ क