द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवन्तो वेगेन समापेतुर्वलं तव ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्नन्वचरत्स राजा पृथिवीमिमाम् |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्नरपतिस्तं यत्नादभ्यधावत ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
इति व्रुवन्नलो राजा दमय़न्तीं पुनः पुनः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्निववृते भ्रातृभिः सह पाण्डवः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्पाण्डवेय़ान्पर्युपास्ते स्म नित्यदा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
इति व्रुवन्स नृपतिः करुणं पर्यदेवय़त् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
इति व्रुवाणं तमहं रामं परपुरञ्जय़म् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
इति व्रुवाणं तमृषिं रक्षांस्युद्धृत्य सागरात् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्राहातिमन्युमान् ||
५६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवाणा अन्योन्यं जघ्नुर्योधा रणाजिरे ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
इति व्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमवेदय़त् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
इति व्रुवाणाः संमूढा जघ्नुरन्योन्यमाहवे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
इति शक्रोऽव्रवीद्धीमानापत्सु भरतर्षभ ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
इति शप्त्वा नृपं क्रुद्धः शृङ्गी पितरमभ्ययात् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
इति शल्य विजानीहि यथा नाहं विभेम्यभीः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इति शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
इति शव्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमीरितः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
इति शूरार्थवचनैराभाषेतां परस्परम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
इति श्रुत्वा च तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरवः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
इति श्रुत्वा त्वधिक्षेपं कृष्णाद्दुर्योधनो नृपः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
इति श्रुत्वा पुलोमाय़ा भृगुः परममन्युमान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
इति श्रुत्वा वचः सोऽथ चरणावभिवाद्य च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य भुजगस्य रुरुस्तदा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
इति श्रुत्वा स नृपतिः पुत्रज्ञातिवधं तदा |
५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
इति श्रुत्वेन्द्रवचनं सर्वभूतानि मारिष |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
इति स द्रुपदो राजा सर्वतः समघोषय़त् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
इति स श्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
इति संवदतोरेव तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
इति संशव्द्यमानानि शृणु कर्मेन्द्रिय़ाण्यपि ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
इति संस्तूय़मानो हि मार्जारेण स मूषकः |
१८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
इति सङ्कल्प्यतां वुद्ध्या शरीरार्धं ममार्जुनः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
इति सञ्चिन्त्य दुःखार्ता भर्तारं दुःखितं तदा |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
इति सञ्चिन्त्य दुर्मेधा धर्षय़ामास तत्पय़ः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् |
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा दैवतान्यर्चय़त्तदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा पुराणं विश्वमीश्वरम् |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा भक्त्या नाराय़णस्य ह |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा श्रद्दधानः स्त्रिय़ा वचः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
इति सञ्चिन्त्य राजासौ नोत्तरं प्रत्यपद्यत ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
इति सञ्चिन्त्य वहुधा वुद्धिमान्भरतर्षभ |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
इति सञ्चिन्त्य वार्ष्णेय़ मय़ैतत्समुपेक्षितम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
इति सञ्चिन्त्य स तदा भ्रातुः प्रिय़हिते रतः |
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
इति सञ्चिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
इति सञ्चुक्रुशुर्देवाः कृते कर्मणि दुष्करे ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
इति सञ्चोदितस्तेन धीरो निश्चितनिश्चय़ः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
इति सत्यं महाराज वद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
इति सत्यं महाराज वद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ||
५१ ख