भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
ईक्षते योगय़ुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
भीम उवाच
ईक्षस्वैतां भारतीं दीर्यमाणा; मेते कस्माद्विद्रवन्ते नरेन्द्राः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
ईक्षितः प्रतिवीक्षेत मृदु चर्जु च वल्गु च ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
ईक्षितश्चार्जुनो भ्रात्रा मत्स्यं वचनमव्रवीत् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत्तदा |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ईक्षितुं नोत्सहन्ते स्म तव सैन्यानि भारत ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
ईक्षितृप्रीतिजननं शुक्राङ्गारकय़ोरिव ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ईक्षितृप्रीतिजननं सर्वपार्थिवपूजितम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ईक्षितृप्रीतिजननं सिद्धचारणसेवितम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजानः क्रतुभिः पुण्यैः पर्यगच्छद्वसुन्धराम् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
ईजानाः पितृय़ानेन देवय़ानेन मोक्षिणः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालय़त् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालय़त् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजानो वितते यज्ञे व्राह्मणेभ्यः समाहितः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजानो वितते यज्ञे व्राह्मणेभ्यः समाहितः ||
९४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
ईजिरे क्रतुभिः श्रेष्ठैस्तत्पदं परमं मुने ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
ईजिरे क्रतुभिश्चापि नृपास्ते कुरुनन्दन ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ईजिरे च महाय़ज्ञैः क्षत्रिय़ा वहुदक्षिणैः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
ईजिवांस्त्वं जपैर्होमैरुपहारैश्च मानद ||
८४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजे च वहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवत्स्वाप्तदक्षिणैः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
ईजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
ईजे चाप्यश्वमेधेन यय़ातिरिव नाहुषः |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत्पृथिवीपतिः |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
ईजे राजर्षिय़ज्ञेन सद्यस्केन विशां पते |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
ईड्यो हस्ती सुरव्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः |
१४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
प्रजा ऊचुः
ईतय़ो नुद भद्रं ते शन्तनोः कुलवर्धन ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
ईतय़ो व्याधय़स्तन्द्री दोषाः क्रोधादय़स्तथा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
ईदृगल्पं च वक्तव्यमविक्षिप्तेन चेतसा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
ईदृग्गुणो मानवः सम्प्रय़ाति; लोकं गवां शाश्वतं चाव्ययं च ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
ईदृग्रूपमहं मन्ये पार्थस्य युधि निग्रहम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ईदृशं दुःखमानीय़ मोदते पापपूरुषः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
ईदृशं परमं स्थानं निरय़ास्ते च तादृशाः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
ईदृशं भवती कञ्चिदुपाय़मनुपश्यति |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
ईदृशं वचनं व्रूय़ाद्भवती पुत्रमेकजम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
ईदृशं व्यसनं दद्याद्यो न कृष्णसखो भवेत् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ईदृशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं कदाचन ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
ईदृशः पुरुषोत्कर्षो देवि देवत्वमश्नुते |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
ईदृशः स महादेवो भूय़श्च भगवानजः |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
ईदृशः स महादेवो भूय़श्च भगवानतः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मय़ानघ |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
ईदृशस्तु त्वय़ा स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
ईदृशस्य कुतो राज्ञः सुखं भरतसत्तम ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
ईदृशा व्राह्मणेनोक्ता वाह्लीका मोघचारिणः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
ईदृशानशिवान्घोरानाचारानिह जाजले |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ईदृशानां सहस्राणि विशिष्टानामथो पुनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
ईदृशान्पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वय़म् ||
१ ख