वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजाय़त ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
ईर्ष्युः परसुखं दृष्ट्वा आतताय़्यवुभूषकः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ईर्ष्युर्गन्धर्वराजः स्म जलक्रीडामुपागतः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
धृतराष्ट्र उवाच
ईर्ष्युर्दुरात्मा मानी च श्रेय़सां वचनातिगः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
ईर्ष्येप्सा पैशुनं युद्धं ममत्वं परिपालनम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
ईरय़त्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६९
धृतराष्ट्र उवाच
ईरय़न्तं भारतीं भारताना; मभ्यर्चनीय़ां शङ्करीं सृञ्जय़ानाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
ईशं ह्यसुर विद्मस्त्वां वय़ं सर्वे धनेश्वरम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ईशः कर्ता कृतिर्दक्षो भुवनो दिव्यकर्मकृत् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
ईशः सन्सोऽपि तेनैव कर्मणा सम्प्रय़ुज्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
ईशः सर्वस्य भूतस्य स्थावरस्य चरस्य च ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजसः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ईशते भगवानेकः सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ईशन्नपि महाय़ोगी सर्वस्य जगतो हरिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
ईशस्त्वं सर्वभूतानां ये दिव्या ये च मानुषाः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
विष्णुरु उवाच
ईशस्त्वमसि लोकानां चराणामचराश्च ये |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
अर्जुन उवाच
ईशस्त्वय़ं कस्य पराजितात्मा; तज्जानीध्वं कुरवः सर्व एव ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
ईशाः स्म सर्वे तव राजपुत्रि; भवन्ति ते धार्तराष्ट्रा न पार्थाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकधृक् ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
ईशानं च स्थितं दृष्ट्वा गगनात्सहसा च्युता ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
ईशानं वरदं पार्थ दृष्टवानसि शङ्करम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
ईशानं शङ्करं सर्वं शिवं विश्वेश्वरं भवम् |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
ईशानं सर्वलोकस्य वज्रिणं समुपासते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
ईशानः सर्वभूतेषु हविर्भूतमकल्पय़त् |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
कर्ण उवाच
ईशानस्य यथा व्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ईशानहेतोः प्रतिनिर्मितां तां; त्वष्ट्रा रिपूणामसुदेहभक्षाम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
शन्तनुरु उवाच
ईशानाः सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ईशानाध्युषितं नाम तत्र तीर्थं सुदुर्लभम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
ईशानाय़ भगघ्नाय़ नमोऽस्त्वन्धकघातिने ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ईशानाय़ाप्रमेय़ाय़ निय़न्त्रे चर्मवाससे |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
ईशानेन तथा सख्यं पुत्रं च नलकूवरम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्वं मनसश्च ते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
ईशो गोप्ता च देवानां प्रिय़कृच्छङ्करस्य च ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
ईशो जनपदस्यास्य पुरस्य च महावलः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वरः |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
अर्जुन उवाच
ईशो राजा पूर्वमासीद्ग्लहे नः; कुन्तीपुत्रो धर्मराजो महात्मा |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
ईशो वा ते यद्यनीशोऽथ वैष; वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
ईशो ह्यसि पय़ः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरन्दर |
९ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोपामुद्रो उवाच
ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुमिहेश्वर |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
ईशोऽहमपि सर्वस्य करिष्यामि तु तेऽर्थिताम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ईशोऽहमस्मीति समन्युरव्रवी; द्दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
ईशोऽय़ं सततं देही नृपते पुण्यपापय़ोः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
ईशौ हि तौ महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तने |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
ईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
ईश्वरं चापि भूतानां धातारं मा विचिक्षिपः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
ईश्वरं तं विजानीमः स विभुः स प्रजापतिः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं वित्तं प्रजापतिः |
४० क