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भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
उक्त एष महाराज किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
उक्तं जितोऽस्मीति च पाण्डवेन; तस्मान्न शक्नोमि विवेक्तुमेतत् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं तच्छ्रुतमस्माभिर्नास्तिक्यं तु प्रभाषसे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तं तात मय़ा पूर्वं गच्छतस्ते तपोवनम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं ते विधिवद्राजन्व्राह्मणस्वे पितामह |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
उक्तं त्वय़ा पुरा वीर यथा वीरा निपातिताः ||
५९ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं त्वय़ा वुद्धिमता यन्नान्यो वक्तुमर्हति |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ४६
द्रोण उवाच
उक्तं दुर्योधनेनापि पुरस्ताद्वाक्यमीदृशम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तं न प्रतिजग्राह मानमोहवशानुगः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते; मय़ा यत्ते हितमासीत्तदानीम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
उक्तं प्रय़ोजनं तत्र धर्मराजेन भारत ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६१
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं भगवता जन्म रामादीनां पृथक्पृथक् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तं भगवता वाक्यमुक्तं भीष्मेण यत्क्षमम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तं भवत्या यच्छ्रेय़ः परमं रोचते मम ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
उक्तं भीष्मेण यद्वाक्यं द्रोणेन विदुरेण च |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
उक्तं भीष्मेण यद्वाक्यं हितं पथ्यं च माधव |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
उक्तं मय़ा द्यूतकालेऽपि राज; न्नैवं युक्तं वचनं प्रातिपीय़ |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
उक्तं युधिष्ठिरेणैव यावद्वाच्यं जनार्दन |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तं वहुविधं चैव नारदेनापि तच्छृणु ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
वासुदेव उवाच
उक्तं वहुविधं वाक्यं ग्रहणीय़ं सहेतुकम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
उक्तं वहुविधं वाक्यं धर्मराजेन माधव |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं वै गोप्रदानं ते नाचिकेतमृषिं प्रति |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
उक्तं हि वहुभिः सिद्धैर्जातमात्रे सुय़ोधने |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तः क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
उक्तः पशुसमो धर्मो राजन्प्राणिनिपातनात् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
उक्तः स देवतानां हि अवध्य इति पार्थिव |
३ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उक्तः स्कन्देन व्रूहीति सोऽव्रवीद्वासवस्ततः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
उक्तपूर्वं कुतो राजन्साम्पराय़े स वक्ष्यति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
उक्तमात्रे तु वचने तय़ा स मृगजीवनः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
कर्ण उवाच
उक्तमेतन्मय़ा पूर्वं गान्धारे तव संनिधौ |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
उक्तमेतन्मय़ा पूर्वं द्रोणेन विदुरेण च |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
उक्तमेतन्मय़ा पूर्वं न तिष्ठति धनञ्जय़े |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
उक्तमेतन्मय़ा राजन्पुरा गुणवतस्तव |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनय़ैः श्रुतम् ||
५७ ग
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवत्यसि गान्धारि यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मय़ासकृत् ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवत्यसि धीराणि वाक्यानि पुरुषोत्तमम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
उक्तवन्तः स्म ते तात भिन्ध्यनीकमिति प्रभो ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद्व्रूहि त्वं जनार्दन ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवन्तो यदा वाक्यमसकृत्सर्ववृष्णय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवांश्च नरव्याघ्रो नैतदेवं भविष्यति |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
उक्तवांश्च महावाहुः कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
५० क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
उक्तवांश्च महावाहो क्वासौ वृष्णिकुलाधमः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
उक्तवांश्चापि यत्पार्थं भीष्मं प्रति नरर्षभम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
उक्तवाक्ये तु नृपतौ सुलभा चारुदर्शना |
७७ क
आदि पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवानप्यशीतांशुं नैव स स्म न तप्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
उक्तवानर्थतत्त्वेन मय़ा सम्भिन्नदर्शनः ||
१७७ ख