chevron_left  उत्तरात्पर्वतादेतेarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
उत्तरात्पर्वतादेते तीक्ष्णैर्दस्युभिरास्थिताः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहावलाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
उत्तरान्तकरीं शक्तिं चिक्षेप भुजगोपमाम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
उत्तरान्वा कुरून्पुण्यानथ वाप्यमरावतीम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
उत्तरापथजन्मानः कीर्तय़िष्यामि तानपि |
४० क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
उत्तराभ्यां च पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यामहं दिवा |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
उत्तरामपकृष्यैनामार्तामार्ततराः स्वय़म् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
उत्तराविषय़े दत्त्वा स्वर्गलोके महीय़ते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
उत्तराश्चापरे म्लेच्छा जना भरतसत्तम ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रय़ाः ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
उत्तरासु त्वषाढासु वीतशोकश्चरेन्महीम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
उत्तरास्वथ कुर्वाणो विन्दते गाः सहस्रशः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
उत्तराय़णमन्विच्छन्भीष्मः कुरुपितामहः ||
८९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
उत्तराय़णमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्यते ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तराय़ाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिन्दम ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
उत्तरीय़मथापश्यद्भ्रष्टं परपुरञ्जय़ः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरीय़ेण पानीय़माजहार तदा नृप ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरीय़ैः करैश्चापि सञ्छाद्य वदनानि ते |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरे कोसलाभागे पुण्ये राजन्महात्मनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १२७
ऋत्विगु उवाच
उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
उत्तरे तु परिक्रम्य सहितः प्रत्युदीक्षते ||
१४ ग
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
उत्तरेण तु पन्थानमार्या विषय़निग्रहात् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
उत्तरेण तु शृङ्गस्य समुद्रान्ते जनाधिप |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
उत्तरेण त्वय़ा सार्धं रमाम्यहमनिन्दिते ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेण दशार्णांस्ते पाञ्चालान्दक्षिणेन तु ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेण महामेरोः शाकद्वीपेन संमितः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
उत्तरेति परिख्याता सर्वकर्मसु चोत्तरा ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत्किञ्चिद्वसु विद्यते |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्चाप्यपोढं माल्यमम्वुभिः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
उत्तरेषु गुणाः सन्ति सर्वे सर्वेषु चोत्तराः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेषु च रम्भोरु कुरुष्वद्यापि वर्तते |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
उत्तरेषु तु कौरव्य द्वीपेषु श्रूय़ते कथा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तदा |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
उत्तरैराय़सैः पीतैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
उत्तरो देवय़ानस्तु सद्भिराचरितः सदा |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरोत्तरमेतेभ्यो वर्षमुद्रिच्यते गुणैः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
उत्तस्थुः समरे तत्र कवन्धानि समन्ततः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
उत्तस्थुः सिद्धिकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसंनिभः ||
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
उत्तस्थौ राजभिः सार्धं देवैरिव शतक्रतुः |
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
उत्तान आस्येन हविर्जुहोति; लोकस्य नाभिर्जगतः प्रतिष्ठा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
उत्तानाभ्यां च पाणिभ्यां पादावस्य मृदु स्पृशेत् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः |
११२ क