आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तितीर्षुर्जलाद्राजन्नग्निकार्यचिकीर्षय़ा ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रिय़काम मम प्रिय़ |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ कुरुशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
सुदेष्णो उवाच
उत्तिष्ठ गच्छ सैरन्ध्रि कीचकस्य निवेशनम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
कुन्त्यु उवाच
उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान्रक्षस्व दारकान् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
उत्तिष्ठ देहि मे मार्गं पश्य वा मेऽद्य पौरुषम् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ न भय़ं तेऽस्ति स्वस्तिमान्गच्छ पार्थिव ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमां दुःखितां प्रपितामहीम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
व्याध उवाच
उत्तिष्ठ भगवन्क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वप वै विरमस्व च ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय़ भय़ं ते नास्ति किञ्चन |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ मा शुचः पुत्र नैष जिष्णुस्त्वय़ा हतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ राजन्किं शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन् |
३७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
उत्तिष्ठ राजन्किं शेषे धारय़ात्मानमात्मना |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ राजन्भद्रं ते न चिन्तां कर्तुमर्हसि ||
४५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठ राजन्भद्रं ते विजेष्यामो रणे परान् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व क्षत्रिय़ोऽसि कुलोद्भवः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व वह गुर्वीं धुरं विभो |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व सहास्माभिः सुय़ोधन ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
उत्तिष्ठ वज्रिन्सम्पश्य देवर्षींश्च समागतान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ व्रज भद्रं ते समाश्वासय़ सोदरान् ||
३७ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ शोकमुत्सृज्य क्षत्रधर्ममनुस्मर ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
वृषपर्वो उवाच
उत्तिष्ठ हे सङ्ग्रहीत्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय़ |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठतस्तत्सहसा शिरोऽगच्छद्धरातलम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
उत्तिष्ठति कवन्धोऽत्र सहस्रे निहते तु यः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठति महाराजे धृतराष्ट्रे जनेश्वरे |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
उत्तिष्ठति यथाकालं मृत्युर्वलवतामपि ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
उत्तिष्ठति सुवर्णाभं वार्भिरापूरय़ञ्जगत् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९
धर्मराज उवाच
उत्तिष्ठत्वाय़ुषोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
उत्तिष्ठध्वं नरव्याघ्राः सज्जीभवत माचिरम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ||
८१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
उत्तिष्ठन्ति विनाशान्ते नरं तच्चास्य रोचते ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठन्नव्रवीदेनामभुजिष्या भविष्यसि |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठस्व विषादं मा कृथा वीर स्थिरो भव ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक्क्रीतोऽस्मि तेऽनघ |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कौरव्य जिज्ञासेय़ं कृता मय़ा |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वासुदेव उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारि मा च शोके मनः कृथाः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय़ सुय़ोधन |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते कृतकार्यः सुखी भव |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते न त्वमर्हस्यरिन्दम |
४ क